Tuesday, 27 June 2017

तुम्हारे आने का इशारा था  ....!


चुप-चाप सी 
चल रही थी
मेरी जिन्दगी ,
एक ठहरी हुयी
नदी सी  ..
ना सुबह के 
होने की थी कोई
उमंग ही , ना ही 
शाम होने की
ललक ही थी ,
दिन चल रहे थे
और रातें रुकी 
हुई सी थी .. सहसा 
ये क्या हुआ था ,
मेरे मन में ये कैसी
हिलोर उठी थी 
शांत लहरों पर 
रुकी हुई मेरी 
ज़िन्दगी की 
पतवार किसने
थाम ली ...!
क्या यह तुम्हारे आने
का इशारा था  ....!

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