Thursday, 22 June 2017

एक रात का इंतज़ार है


जब भी 
खुल कर बरसती 
है घटाए  ...
खिड़की के गीले 
शीशों से परे
धुंधला जाते है 
सब मंज़र  ....
उसी तरह के जब
मैंने माटी की तरह 
ही गूंथना चाहा था
अपने इन हाथो से 
एक आकर देने के लिए 
तुम्हे उस रात के 
सपने में  ...
ऐसी ही एक रात 
का इंतज़ार है 
मुझे बरसो से

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