Monday, 3 July 2017

संग संग हम-दोनों 

तुम्हारी सांसों के पत्ते 
अचानक से गिरे..
और तोड़ दिए 
मेरे मौन को..
मौन...... 
स्याह रात के 
अँधेरे सा मौन..
तुम रुको नहीं ..
कुछ कहते-कहते..
मैं थकूं नहीं 
तुम्हारी सुनते-सुनते..
हलचल हो बस इतनी..
पानी में कंकर जितनी..
ले चलो वहां..
जहाँ... ज़िन्दगी बिता
सके संग संग
हम-दोनों 

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