उषा का प्रादुर्भाव
आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। भ्रम यही है— हम उसे पथगामिनी मान बैठे हैं, जबकि वह तो चेतना की देहली पर स्वतः उद्घाटित होने वाली ज्योति है। ~डाॅ सियाराम "प्रखर"Tuesday, 5 May 2026
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उषा का प्रादुर्भाव
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
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भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ___________________ बदल सकता है,प्रेम का रंग ; बदल सकता है ,मन का स्वभाव ; बदल सकती है ,जीवन की दिशा ; ...
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तेरी याद जैसे ध्रुवतारा वयस्तताओं के महाजंगल में घोर उपेक्षाओं के सागर में निर्मम विरह औऱ तड़पते से तपते मरुस्थल में राह ...
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माँ तुझे सलाम ! •••••••••••••••••• माँ तू मिटटी है, तुझ में मिलकर तुझे सलाम किया है; ख़ुशबू बन कर तेरे ही दिल में सि...