उषा का प्रादुर्भाव
आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। भ्रम यही है— हम उसे पथगामिनी मान बैठे हैं, जबकि वह तो चेतना की देहली पर स्वतः उद्घाटित होने वाली ज्योति है। ~डाॅ सियाराम "प्रखर"
Showing posts with label अंतरसलिला. Show all posts
Showing posts with label अंतरसलिला. Show all posts
Tuesday, 5 May 2026
Subscribe to:
Posts (Atom)
उषा का प्रादुर्भाव
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
-
अक्सर ही मुझे यु लगता है तुम मेरे आस -पास ही हो और मैं तुम्हें पहचान रहा होता हूँ अक्सर होता है ये भ्रम मुझे शीशे के उस पार तु...
-
क्या इतना ही काफी नहीं है तुझे प्यार करने के लिए की ? चाहता हूँ, भर दूँ तुम्हारी झोली खुशियों से ना रहे दुःख का एक कण भी ...
-
तुम नहीं जानती क्यूँ करता रहा हूँ मैं ऐसा और करता ही रहता हूँ हमेशा , जहाँ भी लगता है तुम्हारा कुछ भी सुराग पहुँच जाता हूँ मैं ...