तुम प्रेरणा हो मेरी, तुम धारणा हो मेरी अकेलेपन के जंगलों में अचानक से मिले इक कल्पतरु से छन कर आती हुयी छांव हो मेरी... गयी शाम एक हल्का सा बादल समेट रखा था, बड़ी शिद्दत से जो बारिश की कुछ बूंदें निचोड़ी उस बादल से, लम्हा-लम्हा जोड़ कर जो की तुम वो साधना हो मेरी... पर मैं कौन हु तुम्हारा ये आज तक नहीं जान पाया हु मैं
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