Friday, 5 May 2017

इश्क़ आसां इबादत है












अगर हो इश्क़
सच्चा तो इश्क़
सबसे आसां इबादत है
बिलकुल कलकल बहते
नीर जैसी ना किसी लफ्ज़
की जरुरत ना ही किसी
खास भाषा की मोहताज़
ना किसी खास वक़्त
की पाबन्दी ओर ना ही
कोई मज़बूरी और यही
इबादत अपने आप हर
वक़्त होती रहती है
बिलकुल कलकल बहते
नीर जैसी जंहा पहुंचना है
उसे पहुँचती भी रहती है
ये है सच्चा इश्क़ और एक है
तेरा इश्क़ खोजना उसमें
क्या-क्या नहीं है तेरे इश्क़ में
इबादत होती है क्या?
कंहा बहता है तेरा कलकल इश्क़
कब बिना कहे कुछ समझा है
तेरे इश्क़ ने बोलो और पाबंदिया
ही पाबंदिया है तेरे इश्क़ में
मज़बूरिया ही मज़बूरिया तेरा इश्क़ है ?

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...