मैं आग सी धधकती कविता लिखना चाहता हूँ कि कोई छूए जो तुम्हारे सिवा हाथ झुलस जाएँ, मेरे लफ़्ज़ों के कोयले से आग को विशालतर कर तुम्हारी मज़बूरियो को जला देना चाहता हूँ और बन जाना चाहता हूँ इस ब्रह्मांड का धधकता आख़री लावा जो जला भी तेरे प्यार में और बुझा भी तेरे प्यार में ...
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