Friday, 12 May 2017

एक सवाल














एक सवाल 
बार बार आता है 
मेरे मन में  
कि क्या तब भी 
तुम मुझे चाहोगी ?
जब ... आँखों के 
चारो ओर छा जाएगी 
बीतती उम्र की परछाईयाँ..
और उड़ान कह देगी 
मेरे "सपनो के परों " 
को अलविदा 
शब्द जो अभी 
पहचान है मेरे प्रेम के  
जब रूठ जायेंगे वो 
मेरी कविताओं से 
पड़ जायेगा रंग फीका
मेरी लिखी सियाही का 
तो क्या तब भी मेरी कविताओं को 
गुंगुनायेगी के दोहराओगी मुझे 
सोच में हूँ क्या तब भी 
मुझे यूँ ही चाहोगी ?

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