Tuesday, 30 May 2017

पहला मिलन अधूरा है

तुम्हारे जाने के बाद
एक कोने में बैठकर 
निहारता रहा मैं युहि
पूरा का पूरा कमरा 
तुम बिखरी हुई थी 
उस हेंगर पर जंहा 
तुम्हारी साड़ी टंगी थी 
चादर की सिलवटों में
सोफे पर जंहा बैठकर 
कुछ पिया था तुमने 
पुरे कमरे की सौंधी महक 
में चाह कर भी नहीं 
समेट पाया था मैं 
और रहने दिया यु ही 
हमेशा-हमेशा के लिए
जेहन में तभी तो आज तक
वो पहला मिलन अधूरा है 
और वो अधूरा मिलन 
मांग कर रहा है और-और
इसलिए जेहन में उसी पहले 
मिलन की तरह बिखरी पड़ी हो
जिसे मैं समेटना ही नहीं चाहता  

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