Thursday, 10 October 2019

स्मृतियाँ !


स्मृतियाँ!
तुम्हारी स्मृतियाँ 
सर्दी की एक सुबह 
के कोहरे सी;
तुम्हारी स्मृतियाँ 
उस हिमालय की 
सबसे बर्फीली और 
कठोर चट्टान सी;
तुम्हारी स्मृतियाँ 
मेरे देह पर गोदी 
गयी गोदान सी; 
तुम्हारी स्मृतियाँ 
उस बून्द की सी
जो सिचित हो जाए 
तो तुम्हारा हूबहू 
अक्स पा लूँ मैं; 
तुम्हारी स्मृतियाँ 
उस भभकती आग सी
जिसने बर्षों साँझ ढले 
मानव सभ्यता की 
भूख मिटाई है !

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