Saturday, 31 March 2018

जो कहती नही थकती थी


जो कहती नही थकती थी
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मेरे लिए मुश्किल होगा जीना...
तुम्हारे संवाद के बिना
मेरे लिए मुश्किल होगा बिताना
एक दिन भी तुम्हारी आवाज़ के बिना
मेरे लिए मुश्किल होगा महसूसना
समंदर को समंदर सा जिस दिन
तुम्हारी आँखों में ना झांक सकुंगी
मेरे लिए मुश्किल होगा सुनना
मेरे ही हृदय की स्वर कोकिला
को जैसे वो भी गूंगी हो गयी होगी
और तो और उस दिन मेरे मन उपवन
की कलियाँ भी मना कर देंगी खिलकर
फूल बनने से हवाएं तो जैसे पेड़ो से
निकलेंगी ही नहीं और सांसें तो जैसे
रुक-रुक कर तड़पाएंगी डराएंगी
जैसे अगले ही पल ना आये बस
एक बुझते दिये की लौ सी फड़फड़ाएगी
जो कहते नहीं थकती थी इतना कुछ
वो पिछले कई दिनों से आयी नहीं है
सँभालने मुझे सोचता हु कैसे जी रही होगी वो ?

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