Tuesday, 6 March 2018

अमृत बरसाता चाँद

अमृत बरसाते चाँद 
को देख मेरी रूह भी 
पुकारने लगती है तुम्हे 
सुनो प्रिये कंहा हो तुम 
आओ पास मेरे देखो 
चाँद कैसे बरसा रहा है 
अमृत अपनी धरा पर
सुन रही हो मुझे तुम 
बोलो सुनो ना बोलो 
कुछ तो बोलो कंहा हो
सुन पा रही हो मुझे 
उसकी आवाज़ की 
अधीरता को पहचान 
मैं भी देने लगता हु 
साथ उसके आवाज़ तुम्हे 
पर तुमने शायद खड़ी 
कर रखी है ऊँची ऊँची 
दूरियों की दीवारें हम दोनों 
के बीच तभी तो हमारी 
दी हुई आवाज़ें टकराकर 
उनसे बेरंग लौट आती है 
मुझ तक और मुझे निरुत्तर 
देख रूह चल पड़ती है 
अकेली विरक्ति की राह पर 
बोलो कैसे रोकू उसे मैं 
उस राह पर जाने से ?

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