Saturday, 29 April 2017

सुबह की लालिमा







सको देखता हूं
तो लगता है यूं जैसे
सुबह की लालिमा लिए
आसमां की क्षितिज पर
एक तारा टिमटिमा रहा हो
उसकी खामोश निगाहें
कुछ कहना चाहती है
मुझसे होठों पर है
ढेर सारी बातें फिर भी
न जाने क्यूं चुप है
हंसती है वो तो
चमन में फूल खिलते हैं
बात करती है तो लगता है
दूर कहीं झरने बहते हैं
उसकी शोख और चंचल
अदाएं मुझको दिवाना बनाती है
उसकी सादगी हर पल
एक नया संगीत सुनाती है
इतना तो पता है कि
उसको भी मुझसे प्यार है
कभी तो नज़र उठेगी मेरी तरफ,
उस वक्त का इन्तजार है।

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