Tuesday, 28 January 2020

रूह का रुदन !

रूह का रुदन !

तन्हाईयों की चादर पर 
कोरी चांदनी छिटकी है ;
सन्नाटें में मेरे दिल की 
तमाम धड़कनें कैद है ;
मर्म में डूबे "प्रखर" ने  
ये प्रेम कविता लिखी है ; 
झुलसती ख्वाहिशों की 
अब मुँदती हुई पलकें है ;
प्रखर की सांसों की तमाम 
हलचलें जैसे नाकाम सी है ; 
पिघलती रूह का करुण 
व ख़ामोश ये रुदन है ;
ये सब तुम्हारी ही प्रतीक्षा  
में हिचकी बनकर अटके है ; 
तुम आकर इन सब को अपनी 
सांसों के क़र्ज़ से निज़ाद दिला दो ; 
यूँ क़र्ज़ तले इन सांसों के 
जीना भी कोई जीना है ! 

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