Saturday, 18 January 2020

ख़्वाहिशों के प्रतिबिम्ब !

ख़्वाहिशों के प्रतिबिम्ब !

काग़ज़ की सतह पर बैठ
कर लफ़्ज़ों ने ज़ज़्बातों से 
तड़पने की दरख़्वास्त की है !
विचलित मन ने बेबस 
होकर प्रतीक्षा की बिखरी 
किरचों को समेट कर बीते 
लम्हों से कुछ गुफ़्तगू की है !
यादों के गलियारों से निकल 
कर ख़्वाहिशों के अधूरे 
प्रतिबिंबों ने रूसवा हो कर 
उपहास की बरसात की है !
फिर नहाई शाम सौंदर्य को
दरकिनार कर उड़ते धूल 
के चंचल ग़ुबार ने दायरों 
को लांघ दिन में रात की !

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