Thursday, 16 January 2020

विद्रोह !


विद्रोह !

विद्रोह कर आँसुओं ने 
नयनों को भिगोने का 
संकल्प लिया !
सिसकियाँ ने भी फिर  
कंठ को अवरूद्ध करने का 
फैसला किया ! 
स्वरों का मार्गदर्शन भी 
शब्दों ने ना करने का मन 
बना लिया !
भाव भंगिमाओं ने भी 
रूठ कर कहीं लुप्त होने 
का फैसला कर लिया !
अनुभूतियों के स्पंदनों ने 
भी तपस्या में विलीन होने
का निश्चय कर लिया !
विरह में दूरियों का एहसास 
हमारी इन्द्रियों में भी विद्रोह
भर देता है !

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