मौन ! !
अखर जाता है ,
अक्सर मौन हो जाना
टीस दर्द और कसक
करती तो रहती है ;
व्याकुल पर कितना
कुछ चलता रहता है ;
इस मन के भीतर
पर खालीपन अंतस
का जाने क्यों खुद को
भी अक्सर जाता है ;
क्यों अखर !
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
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