Wednesday, 13 November 2019

हरी कोख का आनंद !


हरी कोख का आनंद !

तुम्हे चाहने के लिए 
अपनी सांसों से तुम्हारे 
विकल ह्रदय को तृप्त 
रखना चाहता हूँ !

तुम्हारे ही भाव मेरे 
लफ़्ज़ों में उतरते रहें सदा 
इसलिए तुम्हारी रज्ज से 
जुड़े रहना चाहता हूँ !

भविष्य में तुम्हारे भाव 
और भी सूंदर हों इसलिए
मैं अब तुम्हारी रूह में 
उतरना चाहता हूँ !

तुम्हारी आँखों में उतर 
आये हरी हुई कोख का 
आनंद इसलिए तुम्हारी 
कोख को सदा सींचते  
रहना चाहता हूँ !

तुम्हारे होंठ सदा यूँ ही 
गुलाबी रस भरे बने रहे 
इसलिए मेरे शहद रूपी 
आखरों को सदैव तुम्हारे 
होंठों पर रखना चाहता हूँ !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...