Thursday, 17 May 2018

सांस है मेरी वो



सांस है मेरी वो 

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वो जो सांस है 
ज़िन्दगी की मेरी 
अपनी ही गति 
से बहती है अभी; 
होकर बिलकुल बेखबर
दर्द से मेरे ;
और बेअसर मेरी 
छुवन से अभी तलक;
मगर जिन्दा रखे
हुए है अभी तलक;
वो मुझे जो अपनी 
शीतल छुवन से 
हर तपन से आज़ाद 
करती है मुझे;
उसकी खामोश 
उपस्थिति अब तलक
करती है तर्क-वितर्क;
जो साँस है मेरी 
ज़िन्दगी की अब 
भी बहती है अपनी 
ही गति से होकर 
बिलकुल बेखबर
मेरे हर दर्द से !

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