Friday, 11 May 2018

मेरी वफ़ा बड़ी मुस्कुराती है


जब भी याद मुझे तेरी 
आती है मेरी वफ़ा मुझ  
पर बड़ी मुस्कुराती है 
दर्द होता है देख उसकी  
कटाक्ष भरी मुस्कान 
फिर भी  खुद पर होता है फक्र 
की मैंने इतने सालों तक जकड़े रखा  
अपनी यादों को ज़ंजीरों में 
ताकि तुम चैन से जी सको वंहा  
और रातों को सकूँ से सो सको वंहा 
लेकिन सुनो कल रात से फरार है
मेरी वो यादें ख्याल रखना अपना 
जैसे तुम्हारी यादें मुझे रात रात सोने नहीं देती 
वैसे ही कंही मेरी यादें तुम्हे ना करे बैचैन   
पर सुनो मेरी यादें तुम्हारी यादों से कंही ज्यादा 
ज़िद्दी और शैतान है पर अगर वो करे तुम्हे कुछ ज्यादा ही परेशान 
तो उनके सामने ही तुम एक आवाज़ देना मुझे 
मैं फिर से पकड़कर उन्हें ला जकड़ूँगा उन्ही ज़ंजीरों में !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...