Tuesday, 12 December 2017

जब मैं लिखता हु

दौड़ती भागती
ज़िन्दगी में ;
तेरे प्रेम की लहरों
के मध्य सिक्त किनारों 
पर कुछ पल ठहराव 
सा मिलता है ;
और जब मैं लिखता हु 
तुम्हारे प्रेम को तो बर्षों 
से दबी प्यास को और 
पिपाषीत पाता हु ; तब  
कोलाहल मचाते भावो को
अक्षर सौंप देता हु ;  
जब मैं लिखता हु 
तो अपने भावों की 
बूंदों से तेरी प्यासी 
धरा को भिगो देता हु ; 
फिर मेरी तन्हाईआं को 
तेरे मखमली तन की 
स्मृतिओं में लपेट कर 
सुला देता हु !

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