Monday, 24 February 2020

पाक रूहें !


पाक रूहें !

ऑंखें सुराही बन 
घूंट-घूंट चांदनी को 
पीती रहीं !
इश्क़ की पाक रूहें
सारे अनकहे राज  
जीती रहीं !
रात रूठी रूठी सी  
अकेले में अकेली  
बैठी रही !
और मिलन के 
ख्वाब पलने में 
पलते रहें !
नींदें उघडे तन 
अपनी पैहरण खुद
ही सीती रही !
हसरतों के थान को 
दीमक लगी वक़्त की 
मज़बूरियों की !
बेचैनियों के वर्क 
में उम्र कुछ ऐसे ही 
बीतती रही !
ऑंखें सुराही बन 
घूंट-घूंट चांदनी को 
पीती रहीं !

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