Tuesday, 5 May 2026

उषा का प्रादुर्भाव

 उषा का प्रादुर्भाव

आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। भ्रम यही है— हम उसे पथगामिनी मान बैठे हैं, जबकि वह तो चेतना की देहली पर स्वतः उद्घाटित होने वाली ज्योति है। ~डाॅ सियाराम "प्रखर"

Tuesday, 11 November 2025

स्पर्शों

तेरे अनुप्राणित स्पर्शों में मेरा समस्त अस्तित्व विलीन-सा है, ये उद्भूत भावधाराएँ अब तेरी अंक-शरण ही अभयी प्रवीण-सा है। ~डाॅ सियाराम 'प्रखर'

Monday, 14 November 2022

प्रेम !!

 



ये सच है 

कि प्रेम पहले 

ह्रदय को छूता है     

मगर ये भी उतना 

ही सच है कि प्रगाढ़  

वो देह को पाकर होता है !

Tuesday, 8 November 2022

यादें !

 



प्रत्येक रिश्तों को 

एक नाम दिया गया 

पर छूट गई यादें 

जिनका हमसे बहुत 

ही आत्मिक रिश्ता 

होता है जिसके सहारे 

हम अपने अपने 

एकाकीपन को जीते है 

यादें जो किसी न्योते 

का इंतज़ार नहीं करती 

बिन बुलाए आकर 

हमारा उन पलों में 

साथ देती है जिन पलों 

में कोई रिश्ता हमारे 

साथ खड़ा नहीं होता !

Friday, 4 November 2022

सुंदरता !!


 
                                                    सुंदरता के न जाने कितने अनगिनत पैमाने है !

पर न जाने क्यों लोग उसे देह के रंग में ढूंढते है !!

Saturday, 29 October 2022

पारिजात !!


                                                                                अलसुबह जब 

चुगने जाती हूँ 

जमीन पर बिखरे 

पारिजात को मैं 

उन्हें चुगते हुए 

नित्य लेती हूँ 

संकल्प जीवन 

पर्यन्त तुमसे उन 

पारिजात सा प्रेम 

करते रहने का मैं !

Thursday, 13 October 2022

करवा चौथ !!


 

अपनी ख्वाहिशों को 

शब्दों का लिबास पहना

कर अपनी शर्म-ओ-हया 

को अपने मायके भेज 

दो तुम !

मैं तुम्हारी ख्वाहिशों 

का चाँद हूँ इस से रोज 

कुछ न कुछ मांग लिया 

करो तुम !


Wednesday, 12 October 2022

शिकायत !

तुम अपनी शिकायतों 

का सिलसिला यूँ ही 

जारी रखना सदा, 

क्यूंकि मैंने देखा है 

तुम्हारी शिकायतों 

के पीछे छुपी उम्मीदों 

को बड़ी आस से मुझे 

टुकटुक देखते हुए, 

उन्हें देख कर लगता 

है कि कुछ शिकायतें 

सदा बनी रहनी चाहिए !



Friday, 4 February 2022

सही वक़्त!

 उसके सही वक़्त 

के इंतज़ार में मेरी 

ज़िन्दगी गुजर रही है 

रफ्ता रफ्ता 

वो बैठा सोच रहा 

समय उसे छू कर 

गुजरे जा रहा 

जब तक सही 

वक़्त आएगा 

वक़्त के निशां 

चेहरे पर नज़र 

आ ही जायेंगे 

तब गीली पलकों 

को क्या छुअन 

की सिरहन पोंछ 

पाएंगी !

Wednesday, 29 December 2021

मिलन की रुत !

 मिलन की रुत से

विरह के दिनों तक
का फासला कितना
लम्बा है

और वो फ़ासला
कुछ ऐसा है जिसको
उम्र का अंतराल भी
तय न कर पाता है

विरह की रुत खत्म
होने तक कहीं ऐसा
ना हो कि आरज़ू ही
मर जाए

आहों के चौराहे का
मंज़र क्षत विक्षत हैं
जिन्हे देख कर ऑंखें
भीगी ही रहती है

आइने से कहती है
किस लिए सँवरती हों
क्यूँ श्रृंगार करती हूँ

क्यूँ उस अजनबी
मुसाफ़िर का मैं
इंतिज़ार करती हूँ

क्यूँ रोज़ रोज़ जीती हूँ
क्यूँ रोज़ रोज़ मरती हूँ !

शब्दांकन © एस आर वर्मा

Tuesday, 28 December 2021

प्रेम के प्यासे !

 सीढ़ियाँ आसमान की चढ़ के

चाँद के एक एक कोने में
मोहब्बत को तलाशते है

और सूरज के सहरा में
दो बूंद पानी की ख़ातिर
मोहब्बत अपनी एड़ियाँ
रगड़ती है

फिर प्रेम के प्यासे
लोग सिसक के अपना
दम तोड़ देते हैं !

शब्दांकन © एस आर वर्मा

Saturday, 18 December 2021

एक रोज़

एक रोज़ जब
मैंने सज्दे से
सर उठाया
तो देखा वो
वहां था ही नहीं
जिसको मैं जाने
कब से पूज रही थी
फिर मैंने सोचा
इस से क्या फ़र्क़
पड़ता है कि वो
वहां है की नहीं
इस से मेरी इबादत'
थोड़ी न व्यर्थ जाएगी !
©SRAMVERMA

Monday, 15 November 2021

पूरी ज़िन्दगी !

 पेट भर खाना 

सोने को बिस्तर 

थोड़ी सी मोहब्बत 

ढाई गज चादर'

और एक चुटकी इज़्ज़त 

के बदले लगभग इस 

संसार की सभी औरतों  

ने अधूरे पुरुषों को भी

अपनी पूरी ज़िन्दगी  

बना ली है !

Monday, 8 November 2021

ग़ज़ल

 


जिनको अपने दिल में जगह दो "राम",

वो अगर दिल दुखाते है तो दुखाने दो ;


एक दिन वो भी समझेंगे इस दर्द को ;

उनके दिल को भी तो कभी दुखने दो !

पहली मोहब्बत!

तेरी ओर    

आने के लिए    

मैंने जो पहला 

कदम उठाया था 

उस मेरे पहले 

कदम के रखने 

के बीच का जो   

थोडा सा वक्त और 

तुझ तक पहुंचने के 

बीच की दुरी थी 

वही कहीं मेरी 

पहली मोहब्बत 

ने जन्म लिया था !

Tuesday, 30 March 2021

पुनरावृत्ति!

हम प्राय ही अपने
कृत्यों की पुनरावृत्ति
करते रहते हैं;
जैसे शब्दों की
भावनाओं की
अभिव्यक्तियों की
और इसी पुनरावृत्ति
में हम गढ़ते हैं;
कई नई कविताएँ
भरे पूरे उत्साह से
जो लिए होती है;
नए नए आकर्षण
नए नए रिश्ते
नए नए संसाधन
नए नए प्रयोजन;
ऐसा भी नहीं कि
पुनरावृत्ति नीरस
और उबाऊ नहीं होती
कई बार होती है परन्तु
तब तक नहीं नहीं लगती
जब तक उनमें से नवीनता
जन्मती रहती है !


 

Tuesday, 26 May 2020

बूंदें !


कुछ बूंदें
जैसे-तैसे
हाथ तो लग गई ,

अब कोई
ऐसा चाहिए
जो इनके
उद्गम का
पता बता सके ,

ताकि उसी
रस्ते पर
चलकर मैं
इसके सागर
को पा सकूँ !

Saturday, 23 May 2020

सौन्दर्याघात !


स्फुटित मेरी श्वास है
स्तब्ध मेरे नयन है
हाय ! ये कैसा उसका
सौन्दर्याघात है
तेज़ बहुत उत्तेजित है
और उल्लसित है किन्तु
स्निग्ध उल्कापात सा है
ढुलमुलायी हवाओं में भी
जैसे कोई न कोई तो बात है
हाँ ये अतर्कित प्रेम का
उदित अनुदित उत्ताप है
मानो मुंदी-मुंदी रातों में
धूप सा वह उग आया है
मेरे पथरीले पंथ पर
दूब बन कर लहराया है
उसने मेरे हिय में ये कैसा
संदीप्त सनसनाहट मचाया है
अब तैर रही हैं लहरें और
और सागर को ही डूबाया है !

तुझे मैं करूँगा प्यार !


तेरे रूप का ये श्रृंगार
अरे रे बाबा हां बाबा -2
तुझे मैं करूँगा प्यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2

तुझ से दुनिया होती आबाद
फिर तू क्यूँ होती पहले बर्बाद
अरे रे बाबा हां बाबा -2
तुझे मैं करूँगा प्यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2

कुछ अपने जवानों की गफलत
कर बैठे जवानी में जो उल्फत
खुशियों का महल आबाद किया
लेकिन खुद को पहले बर्बाद किया
और कितने मिले तुझे बीमार
अरे रे बाबा हां बाबा -2
तुझे मैं करूँगा प्यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2

अच्छे अच्छे गिर जाते है
बस एक तेरी अंगड़ाई में
एक लम्हे में डस लेती है
नागिन बनकर पुरवाई में
मेरे सिवा तेरा कौन बनेगा यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2
तुझे मैं करूँगा प्यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2


तेरे रूप का ये श्रृंगार
अरे रे बाबा हां बाबा -2
तुझे मैं करूँगा प्यार
अरे रे बाबा हां बाबा -2

Friday, 22 May 2020

विकल विरह !


हर साँझ पहर जब
देवालय देवालय में
दीपक जल सिहरता है !

तब तब लौ उसकी
उठ उठ कर मानो
ऐसे लपकती है !

मानो जैसे कोई
विकल विरह तब
तब पिघलता है !

साँझ के धुंधलके में
क्षण-क्षण संकोचित
संगम होता रहता है !

फिर नदी सागर
को खुद में जैसे
डुबोती है !

प्राणों में प्रतीक्षातुर
प्रीत लिए दिन फिर
रात में खो जाता है !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...