उसके सही वक़्त
के इंतज़ार में मेरी
ज़िन्दगी गुजर रही है
रफ्ता रफ्ता
वो बैठा सोच रहा
समय उसे छू कर
गुजरे जा रहा
जब तक सही
वक़्त आएगा
वक़्त के निशां
चेहरे पर नज़र
आ ही जायेंगे
तब गीली पलकों
को क्या छुअन
की सिरहन पोंछ
पाएंगी !
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
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