अपनी ख्वाहिशों को
शब्दों का लिबास पहना
कर अपनी शर्म-ओ-हया
को अपने मायके भेज
दो तुम !
मैं तुम्हारी ख्वाहिशों
का चाँद हूँ इस से रोज
कुछ न कुछ मांग लिया
करो तुम !
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
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