अलसुबह जब
चुगने जाती हूँ
जमीन पर बिखरे
पारिजात को मैं
उन्हें चुगते हुए
नित्य लेती हूँ
संकल्प जीवन
पर्यन्त तुमसे उन
पारिजात सा प्रेम
करते रहने का मैं !
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
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