Monday, 31 December 2018

तुम्हारा इंतज़ार है !

तुम्हारा इंतज़ार है !
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इंतज़ार है मुझे 
कि कभी तो मेरे 
इंतजारो की सीमाए..

बढ़कर तुम्हे छू ही
लेंगी और तुम्हे मेरे 
इंतज़ार का एहसास 
होगा...

तब तो तुम चुपके 
से आगे बढ़कर मेरा 
हाथ थाम ही लोगी...

और मेरे बिखरे सपनो 
को समेट कर उनमे 
रंग भर ही दोगी...
  
इंतज़ार है मुझे 
जब तेरे दिल की 
धड़कन भी मेरे 
दिल की तरह ही 
धड़केंगी... 

और फिर हम होंगे 
सदा-सदा के लिए 
एक दूजे के साथ-साथ !

Sunday, 30 December 2018

अभिव्यक्त अभिव्यक्ति !

अभिव्यक्त अभिव्यक्ति !
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मेरी अभिव्यक्ति 
को पढ़कर भी यु 
जितना आसान 
होता है तुम्हारे 
लिये खामोश 
रहना ,

उतना ही मुश्किल 
होता है यु रोज रोज 
मेरे लिये तुम्हारा 
वो प्यार लिखना ,

जितना आसान 
होता है तुम्हारा 
मुझे देखकर भी
यु सुबह सुबह 
नजरअंदाज करना,

उतना ही मुश्किल 
होता है मेरे लिए 
तुम्हारी वो नज़र-
अंदाज़ी के अंदाज़ 
लिखना,

फिर भी तुम्हारी 
ख़ामोशी मुझे 
करती है विवश 
अब भी करने को 
अभिव्यक्त मेरी 
अभिव्यक्ति !

Saturday, 29 December 2018

मुट्ठी में रख लूंगा !

मुट्ठी में रख लूंगा !
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सोचा था मैंने 
इस मेरी मुट्ठी में  
संभाल कर और  
सबसे छुपा कर 
रख लूंगा तुम्हे,

बड़े जतन से 
बंद की थी ये 
मुट्ठी मैंने रख 
कर तुम्हे यु अंदर,

पर न जाने कैसे 
और कब तू फिसल 
कर मेरी मुट्ठी से यु 
समय की तरह आगे 
बढ़ गयी कि,
  
सूखी रेत की किरकिरी 
की तरह मेरी इस हस्ती 
में रड़कती रह गयी है;

और अब देखता हु 
जब खुद की मुट्ठी तो 
आँखें मेरी यु ही बरबस 
समंदर हुए जाती है ! 
में रख लूंगा !

Thursday, 27 December 2018

बे-मौसमी बारिश !

बे-मौसमी बारिश !
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क्या कभी महसूस 
किया है तुमने कि 
ऊपर से यु कठोर 
दिखने वाला पुरुष 
भी भीगा करता है 
उस धुप भरी दोपहरी 
में भी जब कभी तुम  
उसे अकेला छोड़ कर 
चली जाती हो और 
तब होती है बेमौसमी 
बारिश वंहा जहा कुछ 
पल पहले ही को तुम 
ठहरी थी साथ उसके 
लेकिन सुनो जिस दिन 
तुमने देख लिया उसे   
उस धुप भरी दोपहरी 
में यूँ अकेले भीगते हुए 
उसके बाद फिर कभी 
तुम जा नहीं पाओगी 
छोड़ कर उसे अकेला यु !

Wednesday, 26 December 2018

मेरे दर्द को हर लेती है !

मेरे दर्द को हर लेती है !
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अक्सर वो मेरे बालो में 
अपनी पतली-पतली और 
लम्बी-लम्बी अंगुलिया 
फिराते फिराते हर लेती है;

मेरे हर दर्द को और एक 
शिशु की तरह सिमट जाता 
हु मैं उसकी गोलाकार बाँहों 
में और छोड़ देता हु;

खुद को बिलकुल निढाल 
सा उसके हवाले उसकी 
जकड़न में और कुछ देर 
बाद ख़त्म हो जाता है;

द्वेत का भाव यानी  
दो होने का भाव फिर 
गहरी सांसो के बीच
उठती गिरती धड़कने 
खामोश हो जाती है;

और मिलने लगती है 
आत्माए जैसे जन्मो की 
प्यासी हो और ऐसे ही 
पलो में साकार होता है
सपना ज़िन्दगी का !

Tuesday, 25 December 2018

सच का स्वरुप !

सच का स्वरुप !
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कई बार जब 
अपने ज्ञान के 
चक्षुओं से देखता हु;

तो याद आता है 
कि सच का स्वरुप 
तो एक होता है;

चाहे वो सच तुम्हारा 
हो या वो सच मेरा हो 
या हो वो किसी ओर 
का तो भी;

पर हम दोनों के लिए
तो अब तक वो स्वरुप
दो अलग-अलग ही रहा;

और जंहा सच के स्वरूप 
ही दो हो वंहा समय अपनी 
बात कुछ इस तरह से कह  
जाता है कि;

बदल जाते है रिश्तों के 
मायने फिर आखिर कैसे 
टिके वो रिश्ते जिनमे सच 
के स्वरुप दो होते है !

Monday, 24 December 2018

सर्दी की बारिश !

सर्दी की बारिश !
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आओ इस सर्दी   
की बारिश में 
हम और तुम 
मिलकर खूब 
भीगते है;

थरथराते होंठों 
और सर्दी से 
उठती कँपकपी 
को मिटा देते है;

हम और तुम 
अपनी अपनी 
अग्नि से फिर 
करते है;

संवाद अपनी 
अपनी नज़रों से
कुछ इस तरह की 
जिव्हा को उसकी  
औकात दिखा देते है;
  
फिर मैं तुम्हे 
जी लेता हु पूरी 
की पूरी;
  
और तुम भी 
जी लेना मुझे 
पूरा का पूरा ! 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...