Sunday, 8 July 2018

इश्क़ की स्तुतियां


इश्क़ की स्तुतियां 
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जैसे लोग रिझाते है 
अपने-अपने ईश को 
ग्रंथो में लिखी सबसे 
असरदार स्तुतियों से 
ठीक वैसे ही मैंने भी 
लिखी है अपने इश्क़ 
के लिए प्रार्थनाएं जिसे 
लोग पढ़ते है कविता 
समझकर पर जब एक   
दिन वो सारी लिखी 
जाएँगी प्रेम के ग्रंथो में 
तब वो सच मायने में 
कहलाएंगी प्रार्थनाएं 
जिसे हर वो इश्क़ का 
पुजारी पढ़ेगा जिससे 
उनका इश्क़ रूठा है
फलस्वरूप उनको 
सुनने मिलेगा उसी 
इश्क़ से कहो क्या 
चाहते हो तुम और 
जब वो मांगेगा उसी
इश्क़ को अपने लिए 
तब वो इश्क़ खुद कहेगा 
तथास्तु यही मेरा दिया 
उपहार होगा समस्त इश्क़ 
के पुजारिओं के लिए !

Saturday, 7 July 2018

आश्रय


आश्रय
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क्यों प्रेम को मिलता है 
आश्रय अक्सर दहकते 
हुए अंगारों के बीच ? 
क्यों इसका अर्थ अक्सर 
भटकता रहता है निर्जन 
वनों में और एक दिन थक
हार कर ठहर जाता है 
उस एक जगह जंहा हम
उसे कह कर जाते है रुकना  
थोड़ी देर तुम यंहा मैं आता हु
और वो भूल कर हर लम्हे 
में बीतती अपनी उम्र को बस
करता है इंतज़ार हमारे लौट 
आने का वंही बैठ कर जंहा   
हम उसे कहकर जाते है  
रुकना थोड़ी देर तुम यंहा 
मैं आता हु;इतने समर्पण
के बाद भी क्यों नहीं मिलता
प्रेम को आश्रय सकून की 
पनाहो में और क्यों इसके 
अर्थ को नहीं मिलता एक 
मुकम्मल बागबान ?

Friday, 6 July 2018

किसका प्रेम श्रेष्ठ है




किसका प्रेम श्रेष्ठ है
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तुम ये बताओ मुझे की 
जो प्रेम तुम देती हो मुझे
वो प्रेम तुम्हारा प्रेम है या
जो प्रेम देता हु मैं तुम्हे वो
ही प्रेम तुम लौटा देती हो मुझे 
क्योकि अगर मेरा ही दिया 
प्रेम तुम मुझे लौटती हो तो
मेरे ही प्रेम में कमी है कोई 
और अगर तुम मुझे अपना 
प्रेम देती हो तो फिर प्रेम के
बारे आज तक जितना कुछ 
लिखा पढ़ा और सुना है मैंने
आज वो सब ना जाने क्यों 
झूठा सा प्रतीत होने लगा है 
की स्त्री का प्रेम पुरुष के प्रेम से 
श्रेष्ठ होता है ठीक वैसे ही जैसे 
स्त्री हर मायने में होती है श्रेष्ठ 
फिर बताओ क्यों मैं तुम्हारे 
बिना रातों को सो नहीं पाता
तुम्हारे बिना क्यों मेरे दिन  
वीरान से होते है और तुम्हारे
बिना क्यों मेरी धड़कने भी 
अपनी स्वाभाविक गति नहीं पाती 
और क्यों तुम्हारी घडी की सुई 
मेरे बिना टिक-टिक कर अपना 
समय चक्र पूरा कर लेती है 
तुम ये बताओ मुझे की  ?

Thursday, 5 July 2018

खाली जगह

खाली जगह

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जन्म से लेकर मृत्यु 
के बीच की जो खाली  
जगह है इसको भरने 
में किसी को लगते है 
साठ सत्तर अस्सी नब्बे सौ 
और किसी किसी को सवा सौ 
साल पर एक प्रेम में पागल   
 प्रेमी सदा   
उस खाली जगह को एक 
उस पल में भर देना चाहता है 
जिस पल उसका दिल करता है 
इंकार उसी की बात मानने से  
उस वक़्त जब उसे एहसास 
होता है की वो दिल अब 
उसका ना रहा उसी पल 
वो एक पतंगे के माफिक 
अपनी शमा पर खुद को
कर फ़ना भर देना चाहता है
उस जन्म से मृत्यु के बीच की 
खाली जगह को एक सिर्फ 
उसी का नाम लिख कर  
जिसके कहे में आकर उसका 
दिल उसी की कही बात 
मानने से करता है इंकार !

Wednesday, 4 July 2018

फर्क यथार्थ और खयालो का



फर्क यथार्थ और खयालो का 
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शायद तुमने मुझे अपने
सपनो में इतना देख लिया 
की मैंने अपनी वास्तविकता 
ही खो दी तुम्हारी नज़रों में 
शायद इसलिए की तुम्हारे 
सपनो वाला "राम" तुम्हारी 
सारी नादानियों और मज़बूरिओं 
को मुझसे कंही ज्यादा समझता है 
और कभी कोई शिकायत भी नहीं करता 
ना ही वो कभी नाराज़ होकर जा बैठता है 
तुमसे कहीं दूर और मैं तो अक्सर रहता हु 
नाराज़ तुम्हारी दोहराती हुई नादानियों की वजह से 
और लड़ता ही रहता हु देख कर मज़बूर तुम्हे अपनी 
जिम्मेदारिओं के आगे पर लेकिन शायद तुम्हे अभी 
आभाष नहीं उस फर्क का जो होता है यथार्थ और खयालो में
और शायद तब तक हो भी ना जबतक मैं आना ना छोड़ दू 
तुम्हारे सपनो में और उन सपनो में भी समझने से इंकार ना कर दू 
तुम्हारी सारी नादानियों और मज़बूरिओं को क्यों सही कहा ना मैंने ! 


Tuesday, 3 July 2018

दूर जाने के बाद



     दूर जाने के बाद
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मेरे कहे एक एक शब्द  
को तुमने रख तो दिए 
किसी पुरानी सी दराज़ में  
छुपाकर हर किसी से जैसे 
किसी मृत शरीर से उतार 
कर रख देते है हम उसके 
गहने तिजोरी में संभाल कर
ताकि सिर्फ जरुरत के समय 
वो काम आ सके पर ना याद 
आ सके वो वक़्त-बे-वक़्त   
मुझे नहीं आता ये तरीका 
किसी की याद को आने से 
रोकने का पर जब कभी 
जरुरत होगी तुम्हे अपने 
अकेलेपन को दूर करने की 
तब खोलोगी तुम उस दराज़ 
को अकेले बैठकर जैसे अभी 
फुर्सत के पलो में आ बैठती हो
पास मेरे अपना समय बिताने 
और ये जताने की तुम मेरी 
कितनी करती हो परवाह 
पर सुनो मेरे वो शब्द तब भी  
तुम्हे अपने सामने पाते ही 
मेरी तरह फिर एक बार 
कहेंगे तुम्हे की वो तुम्हे 
अब भी बेइंतेहा मोहोब्बत 
करता है दूर जाने के बाद भी ! 

Sunday, 1 July 2018

गुस्ताखी

गुस्ताखी
गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके 
जो मुझे सिर्फ अंधेरो में मिलना चाहती है ;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की
चाहता है रहना सदा साथ उसके
उसके होंठो पर मुस्कान बनकर 
जो हंसती है अपना दरवाज़ा बंद कर;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके
बनकर सुरीला संगीत उसके कानो में
जो प्रायः संगीत को आँखों से सुनती है ;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके
बनकर यौवन की मदहोश खुश्बू उसके नथुनों में 
जो अक्सर महंगी खुश्बूं लगा कर निकलती है ;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके
कंठ में कोयल की सुरीली आवाज़ बनकर 
जो अक्सर गुमसुम रहना पसंद करती है ;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके
हृदय में अप्रीतम चाहत बनकर 
जो चंद जिम्मेदारिओं के अलावा 
कुछ और रखना ही नहीं चाहती अपने दिल में ;

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की 
चाहता है रहना सदा साथ उसके
बनकर सिन्दूर उसकी मांग का 
जो अक्सर बिना सिन्दूर रहना पसंद करती है ! 

गुस्ताखी तो देखो मेरे दिल की  
चाहता है रहना सदा साथ उसके
जिसे अपने अलावा किसी का साथ पसंद नहीं अब ! 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...