Thursday, 7 February 2019

जब मैं लिखता हूँ !

जब मैं लिखता हूँ !
••••••••••••••••••••
जब मैं लिखता हूँ 
तितलिओं के पंख को 
जुगनुओं की रोशनी दे ;

तब तुम्हें रातों में मेरे 
पास आने का न्यौता 
देता हूँ ;

ताकि तुम्हारी दी हुई 
हर एक भेंट को मैं अपनी 
अंजुरी में भर तुम्हे वो सब 
अर्पण कर दूँ ;

जब मैं लिखता हूँ 
रूष्ट हो गया हूँ तुमसे;
  
तब मुझे सब कुछ फीका 
पड़ता सा महसूस होता है;

तब तुम भरती हो मुझमे 
अपने वातसल्य का झरना 
और फिर घोल देती हो मिठास 
मुझमे; 

फिर से जीने की और तब 
मैं एक और बार अपने प्यास 
का रिक्त घड़ा लेकर अपने 
हाथों में तुम्हारे सामने खड़ा  
हो जाता हूँ ! 

Wednesday, 6 February 2019

आज विवश हुं मैं !

आज विवश हुं मैं !
•••••••••••••••••••
प्रेम है प्यार है 
दुलार है और है; 

इन सब की  
अनुभूति भी;

लेकिन इन सब 
का भान तो मुझे 
तब होता है ना;
  
जब तुम बिलकुल  
पास होती हो मेरे;

और सच कहु तो 
आज भी विवस ही 
पाता हुं खुद को मैं;

क्योंकि जब तुम 
पास होती हो मेरे;
  
तब ज़ज़्बात मेरे
ही मुझसे संभाले
नहीं जाते है !

Tuesday, 5 February 2019

अमर हो गए शब्द !

अमर हो गए शब्द !
•••••••••••••••••••••
तुम्हारी सांसों ने 
मेरे कहे एक-एक 
शब्द में वो ऊष्मा 
भर दी;

जिस से वो मेरे 
कहे एक-एक शब्द 
कब अमर हो गए 
पता ही ना चला;

वो वही शब्द थे जो 
मुझे अब तक सबसे 
ज्यादा प्रिय थे;

अब मैं उन शब्दों 
को घिस रहा हु अपनी 
दोनों हथेलियों से;

और मैं तब-तक 
घिसता रहूँगा इन्हे 
जब-तक; 

वो शब्द मेरी दाहिनी  
हथेली पर तुम्हारी 
नाम की चमकती 
रेखा बनकर ना 
उभर उठे !       

Monday, 4 February 2019

अपनी आत्मा के बिना !

अपनी आत्मा के बिना !
•••••••••••••••••••••••••
चाहता हू अब कुछ 
पल अपने साथ बैठू 
एक कॉफ़ी हो और;

हम दोनो ढेर सारी 
बाते करे हँसे और 
खिलखिलाये जाने
दूसरे को करीब से;

मै खुद से पूछूँ कि  
इतना गम्भीर क्यों है  
और समझू खुद की भी  
मजबूरियां; 

जिस वजह से खुद मैं 
खुद को ही भुला बैठा था 
अब तक खुद को ये भी
बताऊ किसके लिए मैंने 
ऐसा किया था; 

फिर दोनों मिलकर पूछेंगे 
उस से क्यों छोड़ा है तुमने 
मुझे तंहा दिल चुराने के 
के बाद भी मेरा;  

और झगडूं उससे फिर कह दूं 
उस से कि मुझे अब उसकी कोई 
जरूरत नही है मै भी अब जी सकता 
हू अपनी आत्मा के बिना !

Sunday, 3 February 2019

कड़वा सा उनींदापन !


कड़वा सा उनींदापन !
•••••••••••••••••••••••
एक कड़वा सा उनींदापन 
आ बैठता है बिलकुल मेरे पास; 

ठीक उस वक़्त मेरा दिल 
चाहता है अपने दीये जलना;

फिर उन्ही दीयों की रोशनी में
उसी स्याही को लौटा दू; 

अपनी लिखी सारी प्रेम कवितायेँ
जिस स्याही से वो मैंने लिखे थे;

लेकिन फिर अकेले में मैं जब ये 
देखता हु अपनी देह का कितना
हिस्सा बोया है;

अब तक मैंने उसकी देह में ठीक  
उसी पल मेरा वो कड़वा सा उनींदापन 
चुपचाप उठकर मेरे बगल से चल देता है; 

उस ओर जहा से वो आया था
चलकर मेरे पास पाकर मुझे 
नितांत अकेला !  

Saturday, 2 February 2019

नज़रें देखना चाहती है !


नज़रें देखना चाहती है ! 
•••••••••••••••••••••••••
पहले पहल किसको पता 
होता है क्यों ये आँखें बार 
बार और एक सिर्फ उसको 
ही क्यों देखना चाहती है;

क्यों आँखें सिर्फ एक उसको 
होने देना नहीं चाहती अपनी 
इन नज़रो एक पल को भी 
ओझल है;  

पर यही आदत कब सेंध लगा 
कर बस जाती है दिल में बनकर 
चाहत पता ही नहीं चलता है;  

जब तक की लोग ना पूछने लग 
जाए की तुम्हे हुआ क्या है और 
उस दिन आकर जब वो देखता है;

खुद को दर्पण में तो खुद को 
ही नहीं पहचान पाता है जैसे 
किसी अजनबी ने कब्ज़ा कर 
लिया हो उसके व्यक्तित्व पर;  

उसके उस चेहरे पर और वो  
चेहरा तो उस चेहरे जैसा है 
जिसको मेरी ऑंखें बार बार 
देखना चाहती है !

Friday, 1 February 2019

बात को बस बात ही रहने दो !

बात को बस बात ही रहने दो !
••••••••••••••••••••••••••••••••
बात को बस बात ही रहने दो,
तुम खुद को मेरे पास ही रहने दो;
आज बातों को राज ही रहने दो,
आज रात बिन बात के बीतने दो;

लफ़्ज़ों को ख़ामोश ही रहने दो,
बहुत लम्बी है मेरे दिल की बातें; 
सारी बातों को अंदर ही रहने दो,  
बात को बस बात ही रहने दो;

आज जुबां को विराम देने दो, 
लफ़्ज़ों को कुछ आराम करने दो; 
आज चारों भीगी आँखें को रहने दो,
बात को बस बात ही रहने दो;

दर्द को सारे मेरे नाम रहने दो,  
खुद को मेरे सीने से लगी रहने दो;
जुल्फों को यूँ ही हवाओं में लहराने दो,
बात को बस बात ही रहने दो;

इस खामोश मिलन की रात को,  
आज यु बाग़ ए गुलज़ार होने दो;
रखो मेरे लबों पर अपने लबों को, 
और बात को बस बात ही रहने दो;

सुनो दिल में मेरे तुम्हारी वही वो,
पुरानी तस्वीर ही बसी रहने दो;
दोनो के बीच की दुरी को मिटने दो,
बाकी बात को बस बात ही रहने दो !
         

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...