Wednesday, 9 May 2018

इतनी सी गुज़ारिश है



इतनी सी गुज़ारिश है
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ऐ ज़िन्दगी सुन 
इतनी सी गुज़ारिश  
मेरी अब कहीं दूर ना जा,
कर दे रोशन इन सियाह 
रातों को मेरी और कर दे  
शीतल से ठन्डे मेरे तपते 
दिनों को फिर आकर पास   
मेरे मुझे ले ले अपने 
आगोश में और कर दे मुझे  
इस दुनिया से जुदा
ऐ ज़िन्दगी मेरी
आ मेरी आँखों में बस जा
और मुझे अपनी आँखों 
में बसा ले फिर कभी 
तू मुझसे दूर ना जाना 
इतनी सी गुज़ारिश है 
मेरी तुझसे ऐ ज़िन्दगी सुन

Tuesday, 8 May 2018

प्रेम की धुन गुनगुनाती है



प्रेम की धुन गुनगुनाती है 
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अक्सर वो मुझसे 
दूर जाकर , 
अपनी सुरीली 
आवाज़ में प्रेम
की धुन सुनाती है,
और नित नए 
कुछ ख्वाब मेरी ही 
आँखों में बुनती है,
और अपनी सांसो में 
मुझे बांधकर यंहा मुझे
अकेला छोड़ खुद  
मुझसे दूर चली जाती है ,
उफ्फ़! ये ज़िन्दगी 
कैसा असर कर जाती है..
पाटता हु जोर जितनी दूरियां
उससे एक कदम और 
दूर वो चली जाती है,
एक दिन बैठा कर 
पास मेरे मैं उसको 
पूछना चाहता हु, 
फिर किन्यु वो अक्सर मुझसे 
दूर जाकर अपनी सुरीली 
आवाज़ में मेरे ही प्रेम
की धुन मुझे सुनाती है,

Monday, 7 May 2018

केवल प्रेम करना था



केवल प्रेम करना था
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तुम्हे तो केवल
प्रेम ही करना था
डाल सभी जिम्मेदारियों
को मेरे कांधो पर
की तुम जानो कैसे सामना
करोगे इस मतलबी
दुनिया का कैसे समझाओगे
मेरे घरवालों को और
इस प्रेम को कैसे क़ानूनी
जामा पहना मुझे
हक़ दोगे सभी के सामने
ये कहने का की
हा तुम हो सिर्फ मेरे
और मैं हु सिर्फ एक तुम्हारी
अपनी सारी  मज़बूरियों को
ताक पर रख ,
पर अब तक तुमसे
इतना भी नहीं हो सका तुमसे
जबकि मैं अब भी
इंतज़ार में हु की
डाल सभी जिम्मेदारियों
को मेरे कांधो पर
तुम केवल करोगी मुझे प्रेम 

Sunday, 6 May 2018

उष्णता की सार्थकता


उष्णता की सार्थकता
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सीली-सीली लकड़ियाँ जब 
मद्धम- मद्धम आँच में सुलगेंगी 
तो चटकने की आवाज़ तो होंगी ही ; 
पर लकड़ियों का उस आंच की  
तपिश से एकीकृत होकर अपना 
स्वरुप खो देना ;उष्णता की सार्थकता 
को प्रमाणित करती है ;
उष्णता का होना जीवंत बनाता है हमें 
साथ ही सार्थकता का अहसास कराता है ;
आँच पर तपकर ही सोना  
स्वरुप बदलकर कुंदन बनता है  
फिर चाहे ज़िन्दगी हो या हो रिश्ते 
या फिर हो एहसास 
उनमे उष्णता का होना और 
उन सभी को उसमे तपना ही 
जीवन की सार्थकता का प्रमाण होता है 
उसी प्रकार तन की लकड़ियां भी 
मद्धम-मद्धम आँच में पकती रहनी चाहिए 
जिससे आंच की सार्थकता का बोध होता रहे !

Friday, 4 May 2018

मेरे जिस्म का हिस्सा



मेरे जिस्म का हिस्सा
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एक-एक लम्हा जो मैंने 
अपना बोया है तुझमे 
जब उगेगी उसकी फसल
तो सोचता हु क्या क्या 
हासिल होगा हम दोनों को 
शायद इतना कुछ 
जितना ना हुआ हो 
हासिल अब तक 
किसी भी दौलतमंद को 
और वो कभी ना ख़त्म 
होने वाली मोहब्बत हर 
रोज़ खर्च करेंगे दोनों मिलकर 
तब भी वो ख़त्म नहीं होगी   
लेकिन थोड़ा थोड़ा हिस्सा 
मेरे जिस्म का जो मैं तुझ पर  
खर्च करूँगा तो तुम मुझे 
थोड़ा सुकून इकठा कर के देना 
जो मेरे जाने के बाद भी 
तुम्हे मेरी याद दिलाता रहेगा 
और मुझे खर्च होकर भी मलाल नहीं होगा ! 

Thursday, 3 May 2018

मेरे अरमानों की भी तो जननी तुम हो !

मेरे अरमानों की भी तो जननी तुम हो !
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आधी रात कौंधी उसकी चितवन 
और उसने दरवाज़ा अपने घर का 
खुला छोड़ दिया कायम रखते हुए अँधेरा 
और लिख छोड़ा सन्देश अपने घर के दरवाज़े पर 
जिससे होकर आने वाला है उसका चितचोर घर के अंदर  
की मैंने बहुत मुश्किलों से सुलाया है थपथपाकर 
अपने व्यस्क अरमानो को आवाज़ मत करना वरना 
सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा ;आकर कानो में हौले से 
कहा उस चितचोर ने तुम भी यु ही आँखें बंदकर सोने का 
बहाना करती रहो कुछ देर क्योकि मेरे अरमान भी 
मेरा पीछा करते करते आ गए है यंहा तक क्योंकि 
ये तुम्हारे अरमानो की तरह मेरे कहे में नहीं बड़े ही ज़िद्दी है 
मना करते ही सड़क पर उस ज़िद्दी बच्चे की तरह लेट गए थे 
जैसे कोई बच्चा अपनी माँ से चॉकलेट की ज़िद्द करता है 
और माँ के मना करने पर बिगड़ैल बच्चों की तरह 
रास्ते पर लौट लौट तमाशा खड़ा करता है 
और जब तक माँ से चॉकलेट नहीं ले लेता 
तब तक मानता  ही नहीं है तुम बस   
इन्हे यकीं दिला दो की तुम सो गयी हो 
ताकि ये चले जाए फिर हम दोनों साथ
बैठ कर खूब बातें करेंगे अरमानो का क्या है 
ये तो हमारे पैदा किये हमारे ही बच्चे तो है !

Tuesday, 1 May 2018

बेहाल और लहूलुहान चेहरा


बेहाल और लहूलुहान चेहरा
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कितना तीक्ष्ण है 
चेहरा तुम्हारा की वो 
आसानी से समां जाता है 
मेरे चेहरे में और तुम हर  
शाम अलग कर लेती हो 
मेरे चेहरे से अपना चेहरा
फलस्वरूप बेहाल और लहूलुहान 
हो जाता है मेरा चेहरा इस बात से  
तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता 
क्यूंकि तुम्हारा तो सब कुछ
तुम्हारे पास रह ही जाता है
साथ में अपने ले जाती हो 
तुम मेरे अस्तित्व की निशानी 
भी अपने साथ काश की मेरा 
भी चेहरा इतना ही तीक्ष्ण होता 
और मेरा चेहरा जब तुम्हारे चेहरे से 
जुदा होता तो तुम्हारा चेहरा भी 
कुछ यु रोज शाम लहूलुहान होता   
तब तुम्हे उस दर्द का एहसास होता 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...