Friday, 3 May 2019

कवितायेँ सब समेटती है !

कवितायेँ सब समेटती है !
कवितायेँ समेटती है, 
हमारे प्यार व तकरार दोनों के पल भी; 
कवितायेँ समेटती है, 
हमारे मिलन की ख़ुशी व जुदाई का दर्द भी; 
कवितायेँ समेटती है, 
मोहब्ब्त के रंग और अभिव्यक्ति के ढंग भी; 
कवितायेँ साथ साथ समेटती है, 
एक दूजे के द्वारा की गयी मनुहार व इकरार भी; 
कवितायेँ समेटती है, 
कभी करार तो कभी इन्कार भी; 
कवितायेँ समेटती है,
कभी तकरार तो कभी अंगीकार के पल भी; 
कवितायेँ समेटती है, 
दिल-ए-बयान भी जिसमे कभी वो रंग है बदलती भी; 
कवितायेँ कभी रचती है, 
स्वांग तो कभी ख्वाब भी बुनती है; 
कवितायेँ कभी समेटती है,
किरचें भी इसलिए कविताओं का हर सफहा होता है; 
हमारे दिल का आईना भी !

Thursday, 2 May 2019

मोहब्बत भी अजीब होती है !

मोहब्बत भी अजीब होती है !

रूहानी दिलों में जब भी, 
ये मोहब्बत जागती है;

तो पहले ये नींदें उजाड़ती है,
फिर ये झूमती है और नाचती है;

ये फैलती है और बोलती है, 
फिर हर एक किये गए वादे को तौलती है;

सूली और सूल सी होती है, 
ये मोहब्बत भी कितनी अजीब होती है; 

ये जब फैलती है तो पेड़ बनती है, 
और ये छाँव कर के भी धूप देती है; 

कभी कभी तो बस आप अपनी, 
ही रक़ीब होती है ये मोहब्बत;

ये मोहब्बत कितनी अजीब होती है, 
लहू की सूरत ले रगों में दौड़ती है; 

फिर वो ही ख़्वाब बन कर रूहानी, 
दिलों की नज़रों में ठहरती है; 

बादल बन कर फ़लक से बरसती है, 
गर इसे दरिया में डाल आओ तो भी; 
एक समंदर बनकर उभरती है !

Wednesday, 1 May 2019

सुनो..


सुनो..
जिस की हंसी से ही, 
मेरे ह्रदय की बंज़र 
जमीन पर भी, तरह 
तरह के फूल खिलते है;
सुनो..
जिन के नग्मों की, 
इतनी पहुँच है की, 
पंछी उन की लय 
पर चहचहाते हैं;
सुनो..
उस को तो इस तरह, 
चुप-चाप हो जाना, 
बिलकुल नहीं सजता है;
सुनो..
तुम बस इतना ही करो, 
की एक बार बस हँस दो, 
ताकि मेरी जमी हुई साँसों 
में फिर से, ज़िंदगी जी उठे; 
सुनो..
क्योंकि तुम्हारी हंसी से ही, 
मेरे ह्रदय की बंज़र जमीन, 
पर भी तरह तरह के फूल 
खिलते है !

मोहब्बत भी अजीब होती है !


मोहब्बत भी अजीब होती है !

रूहानी दिलों में जब भी, 
ये मोहब्बत जागती है;

तो पहले ये नींदें उजाड़ती है,
फिर ये झूमती है और नाचती है;

ये फैलती है और बोलती है, 
फिर हर एक किये गए वादे को तौलती है;

सूली और सूल सी होती है, 
ये मोहब्बत भी कितनी अजीब होती है; 

ये जब फैलती है तो पेड़ बनती है, 
और ये छाँव कर के भी धूप देती है; 

कभी कभी तो बस आप अपनी, 
ही रक़ीब होती है ये मोहब्बत;

ये मोहब्बत कितनी अजीब होती है,  
लहू की सूरत ले रगों में दौड़ती है; 

फिर वो ही ख़्वाब बन कर रूहानी, 
दिलों की नज़रों में ठहरती है; 

बादल बन कर फ़लक से बरसती है, 
गर इसे दरिया में डाल आओ तो भी;  
एक समंदर बनकर उभरती है !

Tuesday, 30 April 2019

प्रेम के प्रमाण मिले !

प्रेम के प्रमाण मिले !

प्रखर के पुराने शेरों में,
कागज़ के पुराने टुकड़ों में;

उसके एहसासों के ये चंद, 
अभिव्यक्त भाव निकले हैं;

कुछ गुलाब की सूखी पत्तियों,
पर उसकी मेहबूबा के नाम लिखे है; 

कुछ आधी-अधूरी तहरीरें और, 
कुछ खत से भरे लिफाफे मिले है; 

और कुछ तुम्हारी और मेरी गले, 
मिलते हुए की चंद तस्वीरें मिली है; 

कुछ बालों में लगे गजरे तो, 
कुछ टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़े मिले है; 

प्रखर के पुराने शेरों में तुम्हे, 
उसके प्रेम के प्रमाण मिले है !

Monday, 29 April 2019

तुम्हारे हाथों को थामकर !


तुम्हारे हाथों को थामकर ! 

एक दिन तुम्हारे हाथो को,
अपने हाथों में थामकर मैं;  

तुम्हारे सारे दुःख और दर्द को,  
सहर्ष स्वीकार अपना लूंगा मैं; 

एक दिन तुम्हारे धड़कते सीने, 
पर अपना सर रख कर मैं;  

तुम्हारी धड़कनो को अपने,
सारे के सारे सुर दे दूंगा मैं; 

एक दिन तुम्हारी पलकों को, 
अपने होंठो से छूकर अपने सारे, 

के सारे ख्वाब तुम्हारी आँखों, 
में ही बो दूंगा मैं; 

एक दिन तुम्हे अपने गले लगाकर, 
अपने सारे एहसास मैं तुम्हे दे दूंगा;  

एक दिन तुम्हारी आँखों में देखकर, 
कह दूंगा प्यार तो एक तुम्हीं से करता हूँ मैं;   

और अपना सारा का सारा विश्वास, 
उस दिन तुम्हे ही दे दूंगा मैं !

Sunday, 28 April 2019

मैं मोहब्बत करता हूँ !


मैं मोहब्बत करता हूँ !

मैं तो बस अपने दिल, 
की ही बात कहता हूँ;   

कभी उस से समझौता, 
नहीं करता हूँ; 

एक तेरी खातिर मैं,   
खुदा से भी नहीं डरता हूँ; 

बंदिशों में वो रहते है,  
जिनमे कैद राज बड़े गहरे है; 

मैं तो पागल हूँ दीवाना हूँ, 
सच से कभी पर्दा नहीं करता हूँ; 

और सच ये है की मैं तुम्हे, 
बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...