Friday, 2 November 2018

कोई भी रिश्ता टूटता नहीं !

कोई भी रिश्ता टूटता नहीं ! 
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कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता यंहा 
कोई भी रिश्ता टूटता नहीं यंहा

रिश्ता या तो जीता है यंहा
या फिर रिश्ता मरता है यंहा 

पर कोई भी रिश्ता टूटता नहीं यंहा
चाहे बातें बंद हो जाये यंहा की वंहा की   

चाहे मुलाकातें खत्म हो जाये यंहा
या फिर एक नज़र देखना भी फिर 
गंवारा ना रह जाये एक दूजे को यंहा  

पर रिश्ता हमेशा कंही ना कंही 
अपनी सांसें लेता रहता है यंहा 

उन सांसों की बदौलत ही रिश्ता 
कंही ना कंही बना रहता है यंहा 

जीते जी आमने-सामने रहता है
मरने के बाद मन में कंही ना कंही

या स्मृति में या फिर यादों में कंही 
और कुछ नहीं तो आहों में यंहा 

पर रिश्ता रहता है मौजूद यंहा 
कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता यंहा 
हाँ व्यर्थ नहीं जाता कुछ भी यंहा !

Thursday, 1 November 2018

मैंने तो सिर्फ प्रेम किया !

मैंने तो सिर्फ प्रेम किया !
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प्रेम तो किया था मैंने तुमसे 
अपनी आँख और दिमाग 
दोनों बंद कर के;

जबकि कई बार मेरी 
इन्द्रियों होकर सक्रिय 
जताती रही विरोध;

तभी तो करता रहा मैं   
नज़रअंदाज़ विरोध 
अपनी ही इन्द्रियों का;

क्योंकि मैंने तो पढ़ा था 
प्रेम में कभी तार्किक नहीं 
हुआ जाता;

और मैं कभी हुआ भी नहीं 
परन्तु तुमने तो कभी कोई 
बात मेरी मानी ही नहीं;

जब-तक की तुमने उस बात
को आज़माया नहीं क्योंकि
तार्किक हो तुम;

पर क्या तुमने कभी पढ़ा नहीं
या सुना भी नहीं की प्रेम में कभी
किसी तरह के तर्क की कोई जगह 
नहीं होती;

इसलिए मैंने अपने हिस्से का 
प्रेम किया और तुमने अपने 
हिस्से का तर्क;  

प्रेम तो किया था मैंने तुमसे 
अपनी आँख और दिमाग 
दोनों बंद कर के !

Wednesday, 31 October 2018

प्रेम के सफर का साथी !

प्रेम के सफर का साथी ! 
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जब हो जाये किसी को
प्रेम अपने ही प्रतिबिम्ब 
से डरने वाले से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस 
प्रेम के सफर का हमसफ़र
बन जाता है;

जब हो जाये किसी को
प्रेम अपनी ही सांसों की  
तेज़ गति से डरने वाले से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस 
प्रेम के सफर का हमसफ़र
बन जाता है;

जब हो जाये किसी को
प्रेम अपनी ही पदचाप  
की आवाज़ से डरने वाले से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस 
प्रेम के सफर का हमसफ़र
बन जाता है;

जब हो जाये किसी को
प्रेम अपनी ही पदचाप  
की आवाज़ से डरने वाले से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस 
प्रेम के सफर का हमसफ़र
बन जाता है;

जब हो जाये किसी को
प्रेम अपने ही घर की 
दहलीज़ को पार करने 
से डरने वाले से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस 
प्रेम के सफर का हमसफ़र
बन जाता है;

और जब दर्द किसी प्रेम 
के सफर का हमसफ़र हो 
बन जाता है;

तो आँसुओं को देनी पड़
जाती है इज़ाज़त आँखों 
के काजल को बहा ले 
जाने की !

Tuesday, 30 October 2018

रूह चल पड़ी है विरक्ति की राह पर



 रूह चल पड़ी है विरक्ति की राह पर 
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अमृत बरसाते चाँद को देख
मेरी रूह भी पुकारने लगती है तुम्हे 
सुनो प्रिय कंहा हो तुम की 
अब तो आओ तुम पास मेरे 
और देखो कैसे ये सोलह कलाओं 
का कलानिधि चाँद बरसा रहा है 
अमृत अपने अप्रीतम प्रेम का 
अपनी प्राण प्रिये धरा पर यु 
सुनो प्रिय कंहा हो तुम बोलो 
सुन रही हो ना तुम मेरी ये पुकार 
मेरी रूह की आवाज़ को जैसे ही 
मैं अधीरता को छूते देखता हु 
उसी पल मैं भी देने लग जाता हु 
उसका साथ यु तुम्हे पुकारने में
पर तुमने तो खड़ी कर रखी है 
हमारे बीच दूरियों की ऊँची-ऊँची 
दीवार तभी तो हमारी दी हुई ऊँची-ऊँची 
आवाज़ें भी उन ऊँची-ऊँची दीवारों से 
टकराकर बैरंग लौट आती है हम तक 
और फिर मुझे निरुत्तर देख मेरी रूह 
चल पड़ती है विरक्ति की राह पर अकेली 
अब तुम ही बताओ कैसे रोकू उसे उस राह
पर जाने से अकेले की मैं अभी जीना चाहता हु !

Monday, 29 October 2018

मेरे सुरमयी एहसास



मेरे सुरमयी एहसास
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ना देख फिर यु मुझे 
घूरकर अपनी निगाहों से 
की मेरा इश्क़ कंही अपनी  
हद्द से गुजर ना जाए की  
मेरे ज़ज़्बात कंही अब 
छलक कर बाहर ना 
आ जाये की तू रहने दे 
भ्रम ये ज़िंदा की मेरे 
इस दिल ओ जान में 
तू है मुकम्मल शामिल 
रूह-ए-गहराई में दूर तलक
की रहने दे यु ही मुझे खोया 
हुआ तू की तेरी पलकों के 
सायों में कंही छूते ही तेरे
मुझे ये मेरे सुरमयी एहसास 
कंही अब बिखर ना जाए 
की अब और ना यु दूर 
रहकर मुझे और तड़पा 
की ये मेरा इश्क़ कंही अब
सारी हद्दों से गुजर ना जाये  
ना देख फिर यु मुझे तू  
घूरकर अपनी निगाहों से ! 

Sunday, 28 October 2018

समझा लो अपने चाँद को !

समझा लो अपने चाँद को !
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सुनो ना तुम समझा लो 
अपने इस जिद्दी चांद को 
तुम्हारे लिए ये कभी तो 
अमावस का और कभी 
पूनम का तो कभी यु ही 
साधारण तीज का और 
जब तुम पर ज्यादा ही 
प्रेम उमड़ता है तब तो 
ये हरतालिका तीज का 
हुआ फिरता है और देखो 
आज ये करवाचौथ का 
होकर तुम्हे सौभाग्य का
वरदान देने निकला है 
और फिर परसों दुज का 
और फिर एकम् का हों 
जाएगा सुनो इसे अपने 
पास बैठा कर एक दिन 
बड़े प्रेम से समझाओ तुम  
इस बढ़ते घटते क्रम में 
कहीं एक दिन बुझ ही 
ना जाए वरना फिर तुम्हे
ही उलहाने देगा की तुमने 
मुझे रोका क्यों नहीं ।

Saturday, 27 October 2018

तुम्हारी हथेली पर चाँद

तुम्हारी हथेली पर चाँद 
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मैंने तो उस पहले ही दिन  
रख दिया था करवा चौथ 
का चाँद हथेली पर तुम्हारे 
जिस दिन तुमने मेरे प्रेम 
को स्वीकारा था;
  
मैंने तो उस दिन भी रख
दिया करवा चौथ का चाँद
सूरज से चमकते तुम्हारे
गालों पर जिस पहले दिन
मैंने महसूस किया था उन
गालों की उष्णता को;

मैंने तो उस दिन भी रख
दिया करवा चौथ का चाँद
जिस दिन देखा था सुर्ख 
अग्निवर्ण होंठो को पपड़ाये
हुए प्रेम की प्यास में;

मैंने उस दिन तो मानो मैंने 
इस ब्रह्माण्ड के लगभग सारे 
चाँद ही लाकर रख दिए थे 
तुम्हारी हथेली पर जिस दिन 
तुमने सहर्ष ओढ़ ली थी मेरे 
नाम की वो लाल रंग की चूनड़;

पर फिर भी ना जाने तुम अब 
भी क्यों देखती हो मेरे प्रेम के 
आंगन में खड़ी होकर चलनी 
की ओट से उस पहुंच से दूर
चाँद में मुझे;

जबकि तुम्हारा चाँद तो तब से
कैद है तुम्हारी अपनी ही मुट्ठी में
जबसे तुमने उसे चाँद कहकर 
पुकारा था;  

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...