Sunday, 30 September 2018

चीख कर रो पड़ोगी तुम

चीख कर रो पड़ोगी तुम
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मेरे कहे वो सारे शब्द
शायद तुमने रख दिए 
कंही किसी पुरानी दराज़ 
में छुपा कर जैसे किसी 
मृत व्यक्ति के शरीर से 
उतारकर हम रख देते है 
उसकी पहनी सोने की  
अंगूठी ऐसी ही किसी 
पुरानी दराज़ में छुपा कर
ताकि किसी दिन जब कोई 
साथ ना हो और तुम हो जाओ 
नितांत अकेली तब अकेले में 
तुम आकर खोलोगी उस दराज़
को तो काले कपडे में लपेटे मिलेंगे
तुम्हे मेरे कहे वो सारे शब्द जिसमे
साफ़ साफ़ लिखा होगा मैं तुम्हे खुद
से कंही ज्यादा प्रेम करता हु और जब 
मैं तुम्हारे पास नहीं रहूँगा तब मेरे कहे 
ये शब्द भी तुम्हे उतना ही प्रेम करेंगे 
जितना प्रेम मैं तुम्हे तुम्हारे साथ रहकर
करता था और इतना पढ़कर तुम फिर से 
एक बार चीख-चीख कर रो पड़ोगी ठीक 
वैसे ही जैसे तुम रो पड़ती थी मेरे थोड़े 
से जोर से डांट या डपट देने के बाद !

Saturday, 29 September 2018

देह तत्व भेद क्यों है

प्रथम देह तत्व भेद क्यों 
बोलो आज भी अभेद है
देह भाषित तृप्ति 
जिसमे तरलाई है 
जिसमे घणद्रव्य है 
जिसमे सम्मलित 
उद्वेलित आकांक्षा है 
प्रथम देह तत्व भेद क्यों 
बोलो आज भी अभेद है
देह भेद को खोलने मात्र  
ही जो हर माह प्रकटती है  
वो रक्त की एक अविरल  
चिर परिचित पूजित धारा है
जो स्वयं करती संचित है  
घनद्रव्य को अपनी कोख में
करने सृजन उसी बीज  
के मेल से सृजन जिसका 
प्रथम देह तत्व भेद क्यों 
बोलो आज भी अभेद है
जो आज भी कटु सत्य है
की कारक को तो वो वैसे  
भी सदा से ही प्रिय है 
फिर बोलो कर्ता क्यों आज 
भी  इससे कतराता है 
जबकि बाकी सब कहा 
गुणगान इस कौमार्य 
व यौवन का जैसे आज 
भी होता असत्य प्रतीत है 
दूजा देह तत्व भेद होकर 
भी आज अभेद क्यों नहीं है
वो जो तुम्हारा रक्ताभिक 
श्यामल श्रृंगार युक्त है 
जो सख्त होकर भी उदार है 
जो सदैव प्रवेशातुर रहता है  
बनकर नरम खग स्वरुप है
फिर क्यों प्रथम देह तत्व 
भेद बोलो आज भी अभेद है !

Friday, 28 September 2018

प्रेम की उम्र तय कर लो !

   प्रेम की उम्र तय कर लो ! 
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आज कल प्रेम की भी उम्र 
तय होने लगी है प्रेम की 
उम्र खुद मोहब्बतें आगे 
बढ़कर तय करने लगी है 
मुक्त होने के लिए इस 
बंधन से जबकि इश्क़ 
उसे वफ़ा के साथ निभा 
रहे होते है अपना अपना 
प्रेम और मोहब्बतें समय
समय पर परखती है 
अपने-अपने इश्क़ को 
अपने अपने तय मापदंडों 
पर ठीक वैसे जैसे प्रत्यंचा 
परखती है खुद पर चढ़े तीर 
का तनाव ताकि जब वो छूटे 
प्रत्यंचा से तो वो इतनी दूर 
जाकर गिरे की जब वो लौटकर 
आये प्रत्यंचा के पास तब तक 
प्रत्यंचा तीर के बंधन से मुक्त 
होकर उड़ चले खुले गगन में 
तलाशने कोई और नया नुकीला 
तीर जो खुद छोड़ा हुआ होता है 
किसी और स्वक्छंद मानसिकता 
वाली प्रत्यंचा के द्वारा उसी मिलती 
जुलती इक्षा के साथ कुछ इस तरह 
आज कल आहे बढ़कर मोहब्बतें 
तय कर रही है उम्र प्रेम की अपने
अपने मापदंडों के अनुसार !

Thursday, 27 September 2018

यु तो तुम कभी थी ही नहीं साथ मेरे !

यु तो तुम कभी थी ही नहीं साथ मेरे !
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यु तो तुम कभी थी ही नहीं साथ मेरे
ये तो बस मैं ही था जो बार-बार तुम्हारी 
तमाम गलतियों के भी लौट आता था;
ये तो बस मैं ही था जिसके पास तुम्हारे 
सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था,
ये तो बस मैं ही था जो तुम्हारे बगैर 
सांसें भी ठीक से नहीं ले सकता था,
ये तो बस मैं ही था जिसे लगता था, 
तुम्हारे बगैर ली गयी सांसें कंही मुझमे  
दम भरने की बजाय दम घोट ना दे, 
ये तो बस मैं ही था जो दम घुटने के 
दर से दौड़ा चला आता था तुम्हारे पास,
ये तो बस मैं ही था जो बार-बार तुम्हारी 
तमाम गलतियों के भी लौट आता था;
लेकिन जाने क्यों इतने दर्द सहने के बाद 
अब दम घुटने के दर्द ने ही दम तोड़ दिया है,
तो सोचता हु अब ना लौट कर भी देखु की 
कंही सच में अगर दम घुट जाता है तो 
क्या उसके बाद भी दर्द सिर्फ मुझे होगा ?
या तब तुम भी मेरी ही तरह डर कर मेरे ही 
पास मेरी इस गलती को माफ़ करने आओगी !     

Wednesday, 26 September 2018

उम्मीदों में निहित विश्वास

उम्मीदों में निहित विश्वास 

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उम्मीदों के साथ ही 
जिया जा रहा था मैं 
उम्मीदों में ही निहित था  
मेरा अकूत विश्वास भी 
की इस धरा पर वो सब 
सच होता है जिसे हम 
छू पाते है जिसे हम 
देख पाते है जिसे हम 
सुन पाते है पर ना जाने 
क्यों तुम्हे अच्छी तरह 
छू लेने के बाद तुम्हे  
देख लेने के बाद और  
तुम्हे सुन लेने के बाद 
भी अब तक तुम मेरे 
लिए स्वप्न ही बनी हुई 
क्यों हो हां सच में अब 
तक तुम मेरे लिए स्वप्न
ही तो बनी हुई हो !

Tuesday, 25 September 2018

कभी महसूस करना तुम

कभी महसूस करना तुम••••••••••••••••

खामोशियाँ कभी मरती नहीं
दर्ज़ रहती है हमेशा हृदय के 
अन्तः स्थल में;

कभी महसूस करना तुम,

खामोशियाँ कभी मरती नहीं
अक्सर जोर-जोर से शोर करती हैं
तन्हाईओं में सन्नाटों में;

कभी महसूस करना तुम, 

तब जब तुम्हारे चारों ओर 
पसरा हुआ हो ढेर सारा सन्नाटा;

कभी महसूस करना तुम,

और हाँ तुम्हारे घर की आलमारी 
में रखी मेरे भावों में लपेट कर भेजी 
मेरी लफ़्ज़ों में बयां मेरी मोहोब्बत; 

कभी महसूस करना तुम,

जैसे ही लगाओगी उन्हें हाँथ 
ये शोर मचाएंगी और तोड़नी पड़ेगी 
तुझे अपनी खामोशियाँ;

कभी महसूस करना तुम,

मैं तो अक्सर रातों को महसूस
करता हु तो मेरी रातें सुलग जाती हैं,
फिर ना तुम आती हो ना ही आती है नींदें; 

कभी महसूस करना तुम, 

सोने के पहले पढ़ना मेरी लिखी 
ये सुलगती हुई सी प्रेम कवितायेँ 
शोर मचाएंगी जोर-जोर से और 
तुम्हे तोड़नी पड़ेगी अपनी खामोशियाँ !

Monday, 24 September 2018

आखरी झपकियाँ



आखरी झपकियाँ
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कभी न कभी  
हमसब ज़िन्दगी  
के उस पन्ने पर 
पहुंचेंगे जंहा तकिये 
पर अटकी हमारी 
आखरी झपकियों 
के सहारे हम देख 
रहे होंगे अपनी आखरी 
ख्वाहिशों के सपने
वो सपने यही रहेंगे 
इसी धरा पर चाहे
यंहा हम रहे या ना रहे 
सपने होते ही है अमर
वो कभी नहीं मरते 
हम इंसानो की तरह 
उनकी उम्र ना हम 
तय कर पाते है ना 
ही तय कर पाती है 
विधाता और उन्ही 
अधूरे रह गए सपनो
की खातिर हम सब 
लेते है एक बार फिर 
पुनर्जन्म उन्ही अधूरे
रह गए सपनो को करने
एक बार फिर से पूरा 
हां एक बार फिर से पूरा !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...