Friday, 31 August 2018

ज़िन्दगी का प्रेम

ज़िन्दगी का प्रेम 
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मन तो नहीं पर 
कुछ तो लिखना है
क्योकि मैंने कहा था
उसे जब तक हु तब 
तक लिखता रहूँगा  
बाहर रात लगभग 
अब ठहर चुकी है
हाँ अंदर भले ही 
एक झंझावात से 
घिरा हुआ हु मैं आज  
लेकिन लिख रहा हूँ 
कई दिनों से ज़िंदगी 
को यु दौड़ते दौड़ते 
देखकर अब मेरा मन 
यु कर रहा है जैसे  
कुछ पलो के लिए 
रोक दू इसे और अपने 
आस-पास हो रहे इस 
दुनियावी शोर से  
खुद को कुछ दिनों 
के लिए अलग कर लू  
इन सब झंझावातों से 
चाहता हूँ कि थोड़ी देर के 
लिए ही सही लेकिन मैं 
अतीतजीवी हो जाऊँ 
और चुपचाप उस शांति
को महसूस कर तुलना 
करू वो ज्यादा सकूँ 
देता है या ये दौड़ धुप
करती ज़िन्दगी का प्रेम !  

Thursday, 30 August 2018

सूरज चाँद बन जाता है



सूरज चाँद बन जाता है 
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तेरी इन गोलाकार 
बाँहों में सिमटता 
फैलता सा मैं 
हर साँस तेरी को  
अपनी सांसो में 
समेट लेता हु और 
मैं बून्द-बून्द अपने  
अस्तित्व की तेरी 
रूह में उढेल देता हु  
तो ऐसा लगता है जैसे 
मैं मरते मरते भी थोड़ा 
और जी लेता हु और यु 
भी लगता है जैसे सूरज 
चाँद बन जाता है अपनी 
चकोर से मिलकर लेकिन    
यु कुछ पल का मिलना 
फिर कई रातों और दिनों
के लिए बिछुड़ना जैसे 
सूरज से चाँद बनने का 
अधिकार ही छीन लेना 
फिर निरंतर अपनी ही 
ऊष्मा में कितने दिनों 
तक जलना और मन 
में फिर से मिलने की 
चाह को मरने ना देना 
कैसे करता हु मैं ये सब  
क्या कभी महसूस पायी हो ?

Tuesday, 28 August 2018

दिल का बिछौना

दिल का बिछौना 
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मैंने कहा और कई 
बार कहा तुम्हे मेरी  
आँखों में बसी हो तुम 
तुमने पूछा कहाँ दिखती  
तो नहीं मैंने कहा दिल में 
उतर जाती हो जैसे ही 
तुम्हारी नजर मेरी नज़रों  
को देखती है जैसे कई बार 
चाँद आसमां के पहलु से 
उतरकर झील के ठन्डे 
नर्म बिछौने में चला जाता 
है सोने थककर चकोर की 
लुका छुपी के खेल से उसी 
तरह तुम भी सोने चली 
जाती हो नरम नरम मेरे 
दिल के बिछौने पर जब भी 
मैं आना चाहता हु एक और 
बार तुम्हारे करीब बोलो ऐसा  
ही करती हो ना तुम अक्सर
मेरे साथ मुझे अपने बेहद 
करीब बुलाने के लिए !  

Monday, 27 August 2018

ज़िन्दगी के सिक्त किनारें


ज़िन्दगी के सिक्त किनारें 
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दौड़ती भागती सी मेरी 
ज़िन्दगी में तेरे प्रेम की  
लहरों के बीचों बीच सिक्त 
किनारों पर कुछ पल जैसे 
ठहराव सा पाता हु और तब  
लिखता हु तुम्हारे प्रेम को तो  
बर्षो से दबी प्रेम की पिपासा 
को और पिपासित पाता हु 
तब अंदर ही अंदर कोलाहल 
मचाते मैं अपने ही भावों को 
कुछ लफ्ज सौंप देता हु और 
मुझे पता भी नहीं चलता इस 
दौरान मैं जिन भावों को अपने 
लफ्जों में नहीं बांध पाता वो कब 
अश्रु बन तेरी प्यासी धरा को भिगो 
जाते है फिर मेरी तन्हाईओं को तेरे 
मखमली तन की स्मृतियों में लपेटकर 
सुला देता हु और एक पल को मानो जैसे 
जन्मो का सकूँ मिल जाता है और जैसे 
दौड़ती भागती सी मेरी ज़िन्दगी में तेरे प्रेम की  ... 

Sunday, 26 August 2018

पता है ना तुम्हे


पता है ना तुम्हे 
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देखो अगले कुछ ही 
दिनों में फिर से दिन 
छोटे और रातें लम्बी 
होने लगेंगी और फिर 
यादें तुम्हारी मुझे इन 
लम्बी रातों में अकेले 
जागने को मज़बूर करेंगी 
और फिर पूरी की पूरी रात
गुनगुनाऊँगा मैं तुम पर लिखी
अपनी नयी-नयी प्रेम कवितायेँ
और वो बन जाएँगी मेरे प्रेम गीत 
जिन्हे में रातों के सबसे सुनसान 
लम्हो में माचिस की तीली की तरह
इस्तेमाल करूँगा अँधेरी रातों में अकेले
जागने के लिए तुम्हे तो पता ही होगा ना 
यु लम्बी रातें अकेले जागी नहीं जाती बोलो ?    

Saturday, 25 August 2018

मतवाला और ज़िद्दी यौवन

मतवाला और ज़िद्दी यौवन 
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सुनो काफी नहीं होती सिर्फ  
रूह की खूबसूरती इस ज़िद्दी 
और मतवाले यौवन को बांधे 
रखने एक ही खूंटे से सदा  
उसके साथ चाहिए होती है    
दैहिक सुंदरता भी जो आएगी 
जिस्म में जब तुम आदत 
डाल लोगी मेरी बाँहों से 
होकर गुजरने की और तब  
वो आदत एक रोज तुम्हे   
खूबसूरत से भी ज्यादा 
सुन्दर बना देगी जिससे  
तुम कर लोगी अपने वश 
में उस ज़िद्दी और मतवाले
यौवन को तब एक सिर्फ 
तुम ही छायी रहोगी सदा 
सबसे हसीं और खूबसूरत 
बनकर मेरे दिल ओ दिमाग 
पर यंहा तक की जब लोगो 
की नज़र में हो जाओगी तुम  
उम्रदराज समय के साथ तब 
भी मेरी नजर में और मेरी  
रचनाओं में रहोगी तुम यूं ही 
मनभरी सुन्दर यौवना सदा 
रूह की तरह मेरे होने तक !

Wednesday, 22 August 2018

तुम्हे अपना बनाने की आस


तुम्हे अपना बनाने की आस 
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सुनो अगर लिख सको 
कुछ तो कोई पैगाम लिख दो 
तुम्हारी जिन्दगी के पल मेरी 
बची ज़िन्दगी के नाम लिख दो 
ताकि जब लूँ सांस आख़री तब 
भी बस एक तुम मेरे सामने रहो
इक तेरा ही नाम उस वक़्त भी 
मेरी जुबान पर हो और गर 
आसमा उस वक़्त रोये छुपकर 
कंही कोई कोने में और रात 
अगर बेहद सर्द हो तो याद रखना 
ओस की मोटी मोटी बूंदें मेरे प्रेम 
की गवाही में तुझे भीगोएंगी
उस वक़्त तुम अपनी ये धानी 
चुनर उतार कर भीगना ताकि 
मुझे तब भी तुम्हारे निकलते 
आंसू की जगह वो वजह ही दिखे 
जो दिखी थी उस पहले दिन जिस 
दिन देखते ही तुम्हे अपना दिल दे 
बैठा था ताकि एक बार फिर लौट 
कर आउ मैं यंहा तुमसे पहले 
तुम्हे फिर से अपना बनाने 
की ऐसी ही चाह लिए !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...