Saturday, 31 March 2018

जो कहती नही थकती थी


जो कहती नही थकती थी
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मेरे लिए मुश्किल होगा जीना...
तुम्हारे संवाद के बिना
मेरे लिए मुश्किल होगा बिताना
एक दिन भी तुम्हारी आवाज़ के बिना
मेरे लिए मुश्किल होगा महसूसना
समंदर को समंदर सा जिस दिन
तुम्हारी आँखों में ना झांक सकुंगी
मेरे लिए मुश्किल होगा सुनना
मेरे ही हृदय की स्वर कोकिला
को जैसे वो भी गूंगी हो गयी होगी
और तो और उस दिन मेरे मन उपवन
की कलियाँ भी मना कर देंगी खिलकर
फूल बनने से हवाएं तो जैसे पेड़ो से
निकलेंगी ही नहीं और सांसें तो जैसे
रुक-रुक कर तड़पाएंगी डराएंगी
जैसे अगले ही पल ना आये बस
एक बुझते दिये की लौ सी फड़फड़ाएगी
जो कहते नहीं थकती थी इतना कुछ
वो पिछले कई दिनों से आयी नहीं है
सँभालने मुझे सोचता हु कैसे जी रही होगी वो ?

Friday, 30 March 2018

मंदिर में बजती घंटिया



मंदिर में बजती घंटिया
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तुम गूंजने लगती हो 
इस देह व आत्मा रूपी 
मेरे समेत अस्तित्व के 
ब्रह्माण्ड में मंदिर में 
बजती घंटियों की तरह 
और धरती की तरह 
काटने लगती हो चक्कर
मेरे " मैं " के चारो ओर
मैं से हम बनाने की 
उत्तकंठ अभिलाषा लिए 
तुम उस पल में एक 
योगाभ्यासिनी के स्वरुप 
होती हो और मैं होता हु
तुम्हारा वैदिक मंत्र 
जिसे उच्चारित कर तुम
पा लेती हो मेरा समूल 
और एहसास भर देती हो 
मेरे अंदर सम्पूर्णताः का 
फिर सुबह स्वर गुंजारित
प्रतीक्षारत हो उठता हु 
उसी मौन का जो मुझमे
जगाती है आकंठ प्यास ..

Thursday, 29 March 2018

तुम्हारा मेरे साथ होना


तुम्हारा मेरे साथ होना
मेरे लिए जैसे रेगिस्तान 
में खाक छानते हुए 
को एक पानी से भरा 
घड़ा पीने को दे देना ;
तुम्हारा मेरे साथ होना
मेरे लिए जैसे  माइनस
बीस डिग्री में अचानक
से अलाव की तपिश मिल जाना ; 
तुम्हारा मेरे साथ होना
मेरे लिए जैसे बरसो की 
पूजा के बाद ईश्वर का
मेरे सामने प्रकट हो 
पूछना मांगो वत्स और
मेरा उनसे सातों जन्मो का
तुम्हारा साथ मांग लेना;

तुमने मुझे अफसाना मान लिया

मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तुम उनसे मोहब्बत करती हो
तुमको बारिश भाती है
मैं बारिश में अकेला भीगता हूं
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तुम उनसे मोहब्बत करती हो
हर ख्वाब तुम्हारे पूरे हो
बस यही मैने चाहा है
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तुम उनसे मोहब्बत करती हो
मैं कोई गुजरा कल नहीं
जिंदा एक हकीकत हूँ
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तुम उनसे मोहब्बत करती हो
मैने तुम्हें जिंदगी माना
तुमने मुझे अफसाना मान लिया
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तुम उनसे मोहब्बत करती हो

Wednesday, 28 March 2018

तुम्हारी सहेली नींदिया

जिंदगी
हाँ मुझे पता है
जिस दिन मैं
तुमसे दूर जाऊंगा
बस उस एक दिन
तुम्हें नींद नहीं आएगी
बस एक दिन हां बस एक दिन
तुम करवटों और कराहों में
वो एक रात गुजारोगी
पर अगले ही दिन तुम
अपनी नित्य दिनचर्या में
लौट जाओगी और
देखो ना आज ग्यारह ही
बजे थे कि तुम अपनी प्रिय
सहेली नींदिया को अपनी
गोलाकार बाहों में समेट
उसका सानिध्य पा चुकी हो
क्योंकि तुम्हें सिर्फ मुझसे लगाव था
प्रेम तो मैने किया है और कहा भी
कई बार कि मैं यूं ही अनवरत करता रहूंगा
तुम्हें प्रेम और लिखता रहूंगा तुम्हें
क्योंकि मैने अपने प्रेम का नामकरण किया था "जिंदगी"

मेरे हृदयतल में बीज तुम्हारे बोये हुए होते



मेरे हृदयतल में बीज तुम्हारे बोये हुए होते 

तुम मेरी वो आस थी  
जिसके ऊपर टिकी थी
मेरी ज़िन्दगी की डोर  
मेरे सारे सपनो मेरी 
सारी उमीदों की साँस
सब जानते हुए भी 
तुमने आखिर तोड़ ही 
दी मेरी आशाएं फिर भी 
मैं पागल सोच रही हु 
कहु तुमसे क्या तुम 
एक बार फिर से करोगे
वादा क्या तुम फिर से 
जोड़ पाओगे मेरी उम्मीदों
की सांसें ये पागलपन
नहीं तो क्या है बोलो?
गर तुम रखते माद्दा 
मेरे "जामीन " होने का
तो ये जो उम्मीदों के बीज
मैं खुद बो रही हु अपने 
बंज़र हुए हृदयतल में   
वो बीज तुम्हारे बोये हुए होते

Tuesday, 27 March 2018

अब कुछ लिखना चाहती हु



























 अब कुछ लिखना चाहती हु

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उसने कहा "राम" मैंने सुना है इश्क़ में 
लोग "कवि" या "शायर" बन जाते है 
चलो छोड़ो लोगो की बात तुम 
खुद को ही देख लो गुमसुम सा रहने वाला
वो "राम" भी तो लिखने लगा है ,
मैं भी चाहती हु अब कुछ लिखना  
मैंने कहा रहने दो बहुत दर्द से गुजरना 
पड़ता है यु बरसने के लिए मेरा क्या है 
मुझे तो तुमने बादल बना उसमे भर दी है 
इतनी नमी की बरसना हो गयी है मेरी नियति 
फिर ज़िद्द पकड़ कर बैठ गयी मुझे लिखना है 
सिखाना ही होगा मुझे अब मैंने कहा ठीक है 
एक काम करो तुम थोड़े ख्वाब देखो जिसमे हो 
सिर्फ मैं और तुम थोड़ी ख्वाहिशें पालो जिसमे हो 
थोड़ी प्यास और उन्हें सहेजो अपने यौवन में
और जब पौढावस्था की दहलीज़ चढ़ते वक़्त
अधूरे रह जाये वो ख्वाब और ना बुझे वो अतृप प्यास 
तो इकट्ठे कर उन्हें एक एक कर जलना अपने इन हाथो से 
वो जो धुंवा व अग्नि प्रविष्ट करेंगे तुम्हारी रूह में उस दिन
तुम मुझे लिखना राम मैं तुम्हे आज भी उतना ही प्रेम करती हु ?

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...