Wednesday, 28 February 2018

ज़िन्दगी की पाठशाला

कुछ लोग तो यु ही 
पा लेते है दाखिला 
ज़िन्दगी की पाठशाला में
जैसे करनी होती है पूरी 
एक औपचारिकता
और तो और इनायत 
देखो ज़िन्दगी की उनपर
उन्हें मिल जाता है अनमोल  
खज़ाना उस ज़िन्दगी का
जो नहीं मिलता उन्हें भी 
कई बार जो पढ़ते है
चारों पहर की नमाज़  
करते है आठों पहर की पूजा 
रखती है सोलह बरसो 
तक सोमवार पर इतना 
जरूर है की वो जो 
पा लेते है दाखिला यु ही 
ज़िन्दगी की पाठशाला में
वो रह जाते है अन-उत्तीर्ण

Monday, 26 February 2018

कितना अच्छा हो



लोगो की भीड़ से घिरी 
तुम्हारे पास आने को  
आतुर घबराई सी जड़वत 
वंही खड़ी हु पिछले तकरीबन 
पांच साल से ;सोचती हुई 
की कैसे आ पाउंगी पास तुम्हारे
बिना किसी को बताये 
बिना किसी से रास्ता पूछे
बिना अब और घबराये 
बिना किसी के बहकावे में आये
बिना किसी को दर्द दिए  
लोगो की भीड़ से घिरी 
तुम्हारे पास आने को  
आतुर घबराई सी जड़वत 
वंही खड़ी हु पिछले तकरीबन 
पांच साल से ;सोचती हुई
की ना आने से भी गर तुम
यु ही बने रहो मेरे जीने की वजह 
तो कितना अच्छा हो 

अद्भुद सुख की अनुभूति


सुकोमलता से भरी प्रकृति 
किस प्रकार सृजन की प्रक्रिया से 
गुजरती है इससे शायद ही कोई 
पूरी तरह परिचित हुआ है अब तक 
कुछ ना कुछ तो स्वयं प्रकृति से भी 
छूट ही जाता है जब वो निढाल हुई 
होती है तब वो किस किस 
परिस्थिति से गुजरती है 
शायद उसने भी सृजन के पहले 
इसकी कल्पना नहीं की होती है 
तभी तो वो सब कुछ सहज सह लेती है 
आँख बंद होने की प्रक्रिया से लेकर
सिसकियाँ निकलने तक में और
धीमी गति से लेकर बढ़ती बलगति तक
सुकोमल कसाव से लेकर निर्मम
व कठोर कसाव तक की प्रक्रिया में
भी वो अद्भुद सुख की अनुभूति के
साथ साथ पीड़ा सहकर सृजन करती है
शायद ही कोई महसूस कर सकता है 
की कठोरता को किस प्रकार सुकोमलता 
तरलता में परिवर्तित कर देती है 

Sunday, 25 February 2018

निशा का प्याला

जिस निशा का प्याला
पूरी की पूरी रात कलानिधि
के निचे पड़ा रहने के बाद भी   
हयात के मधु से नहीं 
भर पाता वो निशा ही 
समझ सकती है मधु 
का सही सही अंशदान
कियोकि उस निशा के 
प्याले से उतर चुकी 
होती है कलानिधि की 
कलई भी तो उस प्याले 
में पड़ी उसकी कल्पना 
कितनी कड़वी हो जाती है 
इस कड़वाहट का स्वाद भी 
वो समझ सकता है जो 
उस निशा को तहे दिल से चाहने
का साहस करता है और उसे
ये भी नहीं पता होता कब तक
उसे निशा के प्याले की
कड़वी हुई कल्पना को 
पीते रहना पड़ेगा 

Saturday, 24 February 2018

जिद्दी चाँद


सुनो तुम समझाओ ना 
अपने इस जिद्दी चाँद को 
तुम्हारे लिए कभी 
दूज का तो कभी 
हरतालिका तीज का 
तो कभी करवा चौथ का
और कुछ ना मिले तो 
कभी पूनम का कभी
अमावस का हुआ फिरता है 
मुझे डर है कंही ये घटते 
बढ़ते इस क्रम में बुझ ना जाए 
फिर मत कहना कोई तो मुझे
बतलाता मैं उसे समझाती ना   
सुनो तुम समझाओ ना 
अपने इस जिद्दी चाँद को 

Friday, 23 February 2018

वो जताती रही अफ़सोस

वो जिससे जुड़े थे मेरे 
सारे एहसास वो ही  
उन एहसासो को 
रौंद कर जताती रही अफ़सोस  
और बस इतना चाहती रही मुझसे 
कि मैं वो हर बात समझू 
उसकी जो रह जाती है अनकही
वो जिसने जाना समझा मेरी 
बेइंतेहा चाहत को भली भांति 
वो उसी चाहत को कर दरकिनार 
हर बार बस इतना चाहती रही मुझसे 
कि जब भी कोई गलती हो उससे 
मैं करता रहु उन्हें नज़रअंदाज़ 
वो जिसने खायी मेरी कसमे 
निभाने को अपने सारे वादे 
वो ही तोड़कर उन सारी कसमों को 
चाहती रही मुझसे की मैं ना करू 
परवाह उन टूटती कसमों का 
और चाहता रहू उसे यु ही बेइंतेहा  
वो जिससे जुड़े है अब भी मेरे सारे एहसास
रौंद कर जताती है अफ़सोस अब भी 

Thursday, 22 February 2018

काजल को बहा ले जाने की इज़ाज़त

जब हो जाए तुम्हे प्रेम   
अपने ही प्रतिबिम्ब 
से डरने वाले से  ... 
तो दर्द को भी उस सफ़र  
का साथी बना लेना चाहिये 
जब हो जाए तुम्हे प्रेम
अपनी ही सांसो की 
तेज़ गति से डरने वाले 
से तो आंसुओं को दे देनी 
चाहिए इज़ाज़त काजल 
को बहा ले जाने की 
जब हो जाए तुम्हे प्रेम 
अपनी ही पदचाप की 
आहट से डरने वाले से  
तो वक़्त बे वक़्त घर से 
निकलना छोड़ देना चाहिए
जब हो जाए तुम्हे प्रेम
अपनी ही दहलीज़ को  
पार करने से डरने वाले से 
तो तुम्हे उन्मुक्त गगन 
में उड़ने की लालसा को 
त्याग देना चाहिए 
जब हो जाए तुम्हे प्रेम 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...