Wednesday, 12 July 2017

जो सब जानती है


रतजगे करता है वो ...
पूछती हूं... उससे 
बंजर हुई नींदों की वजह...
कहता है..बस यूं ही.........
कभी बे-साख्ता कविता ..
कहे जाता है..
कभी ग़जलें लिखता है...
पूछती हूं..
हवाओं पे सज़दे की वजह..
तो.. बस यूं ही...
मेरा दीदार किया करता है...
कभी ख्वाबों में...
कभी तस्वीरों में...
पूछती हूं..
खोयी-खोयी खामोशी..
का सबब...
फ़िर वही.. बस यूं ही...
जो वजह है इन सबकी 
वजह वो ही पूछे तो 
उसे क्या बताया जाये 
जो सब जानती है                      

जिंदगी कितनी  खूबसूरत


तुम कितनी 
खौफज़दा  हो ,
कुछ लोगो से ,
अजनबी सी निगाह,
बिखरे से अंदाज़,
उखड़ी सी साँसें,
लय खो गयी हो जैसे,
मैं डरता हूँ 
सिर्फ़ तुम से,
और कोई शख्स 
तुम्हारे मुक़ाबिल नहीं,
सहमी सी धड़कन, 
सिसकी सी सांस,
जिंदगी कितनी 
खूबसूरत हो सकती है, 
अब भी गर ड़र न हो… 
तुम्हारे मन के अंदर
तो देख पाओगी तुम 
ज़िन्दगी की सुंदरता 

तब तुम्हे एहसास होगा 

सुनो किसी दिन 
रात में अचानक... 
गहरी नींद से उठो तुम...
और याद आये तुम्हें मेरी....
हर तरफ़ मुझे ढूंढो तुम...
ना खुद का...ना वक्त का 
होश हो तुम्हें...मैं तुम्हारा हु .. 
ये भी भूल जाओ तुम...
बस मेरी ही मेरी तड़प...
बस मेरी ही मेरी याद...
और बेचैन रहो तुम.... 
तुम पुकारो मुझे..
और मेरी सदा ना मिले...
बेबसी में जलो तुम...
बहुत तड़पाया है...तुम्हारी याद ने 
मुझे हर पल...बिन जान जीता हूं 
हर पल.... मैं बिना दिल धड़कन चलती है.....
चाहता हूं बस एक बार..... 
कुछ ऐसा ही.....महसूस करो तुम....
तब तुम्हे एहसास होगा 
जीना कितना मुश्किल 
उसके बिना जिसके लिए 
जीना चाहते है हम                      

Tuesday, 11 July 2017

जिसे है बस इंतज़ार

कुछ सच हैं यहां,
मेरे ज़ेहन के भीतर 
बिखरे हुए कुछ झूठ भी हैं,
डरे सहमे दुबके से,
और है एक कहानी,
जिसे है बस इंतज़ार,
की वो कह दे मुझे  ,
जो है नहीं यहां,
वो है एक हर्फ़,
टूट गया था कभी,
गिरा था आसमानों से,
आज उस हर्फ़ को कोई,
फिर ढूंढता फिरता है 
की वो कहानी जो 
कही जानी है अभी,
मुक़म्मल हो.
और हर्फ़ फिर से जुड़ 
लिखे एक प्रेम भरी कविता 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए

ख्वाब बैठा है खामोश

चिरांग जले और  
एक ख्वाब उतरा, 
वक़्त की देहलीज़ पर, 
बैठा है खामोश, 
की कब उसकी नींद टूटे, 
और देख ले उसे भी ,
आँख भर...
इससे पहले की ,
सहर हो,
और बिखर जाए,
उस का वजूद,
ज़र्रा ज़र्रा,
वो देख ले उसे भी ,
आँख भर इसी उम्मीद में
बैठा है तेरे दर पर
पिछले साढ़े साल से                        
मेरा वो अधूरा ख्वाब 

तेरे होने का एहसास

सुनो मेरा 
ख्वाब सा झीना 
आस का लिबास 
जिसे मैंने कभी  
ओढ़ लिया कभी 
मैंने उसे बिछा लिया 
धड़कनों में बसा 
तेरे होने का एहसास
वो भी सिर्फ मेरी 
होने का ख्याल  
कभी ज़ाहिर किया 
कभी दिल में ही 
मैंने अपने छिपा लिया 
गुज़र गए है 
बहुत बरस बस इसी तरह...
अब और ऐसे 
जिया नहीं जा रहा                        
आकर पास मेरे
तुम मेरे इन एहसासो को 
सच कर दो अब 

चुपचाप मैं  … अकेला    

मैंने,
जीवन के करधे में,
रंगीन रेशमी 
सपनों की बाती,
कात कात सपने बुने , 
ताकि तुम्हें दिखा 
सकूँ सभी पुरे कर ,
फिर सहेज कर रख
दिए तुम्हारी आँखों में 
सभी कहा कुछ भी नहीं... 
तुम उन्हें जानकार भी 
अनसुना कर दो शायद,
जैसे शब्द सब 
अनाथ हों मेरे, 
कोई सुने न उन्हें तो बेचारे,
अक्षर अक्षर हो  
हवाओं में गुम न जायें,
अब गाहे गाहे आंखों 
में देख तुम्हारी  
सपनो को संभाल लेता हु 
चुपचाप मैं  … अकेला                         

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...