Saturday, 7 March 2020

तुम मेरी हो ?


तुम मेरी हो ?

मैं जब जब खुद से 
खफा होता हूँ           
मैं तब तब तुम से 
दूर चला जाता हूँ 
पर फिर भी तुम से 
दूर रह कहाँ पाता हूँ 
पर जब जब तुम मेरा 
ये दिल दुखाती हो 
मैं तब तब खुद से 
खफा हो जाता हूँ 
चंद शब्दों में मैं तुम्हे 
कैसे समझाऊं कि
क्या क्या है इस दिल 
में मेरे तुम्हारे लिए 
क्योंकि शब्द तो होते है 
पर भाव कहाँ से लाऊँ 
मैं तुम्हारे बिना और 
मैंने मान लिया जो कुछ है  
वप सब सब तेरा ही है 
पर तुम मेरी हो फिर 
दूर क्यों हो ये तुम 
समझाओ मुझे ?

Friday, 6 March 2020

प्यार का बंधन !


प्यार का बंधन !

मुझे नहीं चाहिए वकृत 
मानसिकता वाली आज़ादी 
मुझे आदत उस सुख की है
मुझे उस सुरक्षा की जरुरत है 
जो तेरे अपनेपन और तेरे 
प्यार के बंधन में मिलती है 
जो मुझे और किसी की नज़र 
में ऊँचा स्थान भले ही ना 
दिलाये पर तेरे दिल में वो  
स्थायित्व सदा दिलाता है  
मुझे बिलकुल जरुरत नहीं है 
उस आभाषी आज़ादी की जो 
मुझे स्वच्छंदता में डुबो दे  
तुम्हारे प्यार के अटूट और  
अकाट्य बंधन में मैं आकंठ 
डूबी रहना चाहती हूँ !

Thursday, 5 March 2020

मन की बात !


मन की बात !

मैं कवि नहीं हूँ 
ना है मुझे किसी 
खास विधा का ज्ञान 
मैं लिखता वही हूँ 
जो तुम मेरे इस 
मन में उपजाती हो
हां ये भी पता है मुझे
जो बदलती है मेरे इस 
मन के भावों को वो बस 
एक तेरी विधा है और 
वो भी तुम ही हो जो मेरे 
भावों को हु-ब-हु आखरों 
में उतरवाती हो ये मेरे 
मन की बात है इसे 
कोई गीत या कविता 
ना समझा करो तुम !    

Wednesday, 4 March 2020

गहरा जख्म !


गहरा जख्म !

कुछ जख्म ऐसे होते है 
जो दिखते तो नहीं है 
पर दर्द बेइंतेहा देते है
उस जख्म में से रक्त 
तो बिलकुल रिसता नहीं है 
पर जख्म गहरा होता है 
हाल बिलकुल वैसा ही होता है 
उस का जैसे कोई मुस्कुराता 
हुआ खूबसूरत चेहरा अपने 
भीतर आंसुओं का सैलाब 
हंसी के लिबास में छुपाकर 
अपने दिल ही दिल में 
जार जार रोता है !  

Tuesday, 3 March 2020

पर तुम कहाँ हो !


पर तुम कहाँ हो !

भींगी-भींगी रुत है 
भींगे-भींगे शब्द है 
भींगी-भींगी रात है 
पर तुम कहाँ हो ?
भींगे-भींगे भाव है 
भींगे-भींगे होंठ है 
भींगा-भींगा स्पर्श है  
पर तुम कहाँ हो ?
भींगी-भींगी आहट है 
भींगी-भींगी गुनगुनाहट है  
भींगे-भींगे ज़ज़्बात है 
पर तुम कहाँ हो ?
भींगी-भींगी सी तुम है 
भींगा-भींगा सा मैं है 
भींगा-भींगा सा आलम है 
पर तुम कहाँ हो ?

Monday, 2 March 2020

उर्वरक रज्ज !


उर्वरक रज्ज !

हर एक बीज को 
जरुरत होती है 
खुद को उर्वरक 
रज्ज में मिलाने की   
गर उसे अपना 
अस्तित्व पाना है 
तो उसे मिलना पड़ता है
उस रज्ज में तभी तो 
वो पायेगा अपना अस्तित्व
तब ही तो वो बन पायेगा 
एक विशाल वृक्ष 
एक बीज ही तो है 
जिसे जरुरत होती है 
उर्वरक रज्ज की 
जिस में वो गला सके 
मिला सके खुद को  
तब ही तो वो पा सकेगा 
अपना अस्तित्व !

Sunday, 1 March 2020

ना-उम्मीदों के पल !


ना-उम्मीदों के पल !

ना-उम्मीदों के उन पलों  
में भी यूँ लगता है मानो 
मेरे दिल की धड़कन बन 
मुझमें समाये हो तुम 
उम्मीदों के उन पलों में  
भी यूँ लगता है मानो मेरी 
सांसों की सरगम बन मुझमें
ही कहीं गुनगुना रहे हो तुम 
गर अँधेरा ही लिखा है मेरे 
नसीब में तो यक़ीनन मेरी 
उम्मीदों के चिराग नज़र 
आते हो मुझे तुम  
इसलिए आज के बाद कभी 
मत पूछना तुम मुझे कि क्यों 
करती हूँ मैं इतना प्यार तुम से !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...