Sunday, 7 July 2019

कविता !

कविता !

मुझे पता है,
तुम अब तक 
नहीं लिख पायी हो, 
कविता मेरे लिए लेकिन, 
सुनो सच कहूं तो तुम्हारे 
होंठों पर फैली वो मुस्कान, 
मुझे लगती है तुम्हारे द्वारा 
मेरे ऊपर लिखी गयी सबसे 
सुन्दर और हंसी कविता होती है,
जब जब तुम्हे देखता हूँ यूँ खुलकर 
मुस्कुराते हुए तब तब मेरी सारी कविताये
एक पांव पर खड़ी हो कर तुम्हारी उस मुस्कान 
पर लगातार तालियाँ बजाती नज़र आती है !

Saturday, 6 July 2019

वज़ूद !


वज़ूद !

प्रेम हूँ मैं 
वैसे तो मेरा 
अस्तित्व बहुत 
ही बड़ा है ;
पर अगर 
सच कहूँ तो 
डर जाता हूँ ;
कभी कभी 
सच्चाई जानकर ,
मेरी हस्ती बहुत 
छोटी है एक तेरे 
जज्बे से ही मैं हूँ ; 
केवल तेरे दिल 
का वो जज्बा 
जो मुझे कभी 
ईश्वर के समीप 
खड़ा कर देता है ;
और कभी मेरा 
पूरा का पूरा वज़ूद 
तेरे दिल के दरवाज़े 
पर पनाह पाने को  
भूखे प्यासे ही 
तड़पता रहता है !

Friday, 5 July 2019

तुम्हारा एहसास !


तुम्हारे जाने के बाद भी उस कमरे के , 
एक कोने में बैठकर मैं निहारता रहा था ;   

यूँ ही पूरा का पूरा कमरा जहां चारों ओर ,
अस्त व्यस्त सी तुम बिखरी हुई पड़ी थी ;

उस हेंगर पर भी जंहा तुमने आकर अपनी , 
साड़ी टांगी थी उस चादर की सिलवटों में भी थी ; 

और सोफे पर भी थी तुम जंहा बैठकर तुमने ,
साथ मेरे अपने पसंद की अदरक वाली चाय पी थी ; 
  
पूरा कमरा तुम्हारी सौंधी-सौंधी महक में अब भी ठीक , 
वैसे ही महक रहा था जैसे वो तुम्हारे आने पर महका था ; 

मैं चाहता था तुम्हे सलीके से समेट कर केवल अपने ,
जेहन में रखना पर तुम इस कदर महक रही थी ;

कि मैं चाहकर भी नहीं समेट पाया था तुम्हे और ,
तुम्हे यूँ ही हमेशा-हमेशा के लिए वहां रहने दिया था ; 

आज जब तुम नहीं हो साथ मेरे तब भी वो कमरा ,
मुझे वहां तुम्हारे होने का एहसास कराता रहता है ;
  
अब मैं चाहता हूँ तुम उस कमरे की ही तरह मेरे ,   
जेहन में काबिज़ रहो जैसे उस कमरे में रहती थी !

Thursday, 4 July 2019

बांहो के दरमियाँ !


बांहो के दरमियाँ !

एहसास में लिपटा 
वह सूखा सा फूल 
जो रखा सहेज कर 
वो मेरा आज तुम्हें 
दे जाना !

फटे से कागज़ पर 
लिखते रहना बस   
एक तेरा नाम और 
फिर उसे भी सहेज 
कर रख लेना !

कुछ ना कहने पर 
भी मेरे सामने आते 
ही तुम्हारे होंठो का
बेबस हो सुखना !

ना जाने क्यों वो सब  
फिर  सोचते हुए आज 
फिर तुमसे ये पूछने को 
मन कर रहा है

क्या प्रेम की तपीश 
एक दूसरे से दूर रहकर 
भी पनपती रहती है ?

अगर हां तो फिर
ये बताओ मुझे तुम
की एक-दूजे की बांहो 
के दरमियाँ क्या 
पनपता है ! 

Wednesday, 3 July 2019

हम और तुम !


अपने-अपने मुखौटों में हम-तुम ,
कैसे खुद को छुपा कर बैठ गए है ;

हम-तुम अपने-अपने मैं के साथ रहे ,
और बाकी सब को हम भूल गए है ;

सपने जो हम ने साथ-साथ देखे थे ,
सारे वो फिर कैसे तार-तार हो गए है ;

देखने में तो मैं अब भी कली ही हूँ ;
पर मुझ पर भी भवरें मंडरा गए है ,

क्या हम अपने-अपने मैं को त्याग कर ;
तुम और मैं भी अब हम हो गए  है !

Tuesday, 2 July 2019

तुम सा ही अक्स !


तुम सा ही अक्स !

आपूर्तियों को पूरी तरह ,
पूर्ण कर जैसा तुम चाहती हो 
वैसा कर देना चाहता हूँ मैं !

तुम्हे मस्त मौला सा वही 
पहर दे देना चाहता हूँ मैं ,
जिस पहर में हो सिर्फ मैं 
और तुम और कोई नहीं !

चाहे जैसे भी हो हू-ब-हू 
तुम्हारी सी आकर्षक ,
देह का अक्स तुझमे 
उतार देना चाहता हूँ मैं !
  
बर्फ की सिल्लियों सी 
पिघलती हुई हमारे मध्य, 
की तमाम भाव भंगिमाओं को !  

चुन-चुन कर अपने अनुराग 
के सिल्की मज़बूत धागे में , 
पिरो देना चाहता हूँ मैं !    

Monday, 1 July 2019

इश्क़ की ख़्वाहिशें !

इश्क़ की ख़्वाहिशें !

तुम्हारे हृदय पर  
मज़बूरियों ने जो 
घाव कर दिए है ! 

उन पर अब मैं 
मरहम लगा देना 
चाहता हूँ !

किसी भी क़ीमत 
पर लौटना चाहता
हूँ !
  
तुम्हे तुम्हारे सपने 
जिन पर अब कभी 
प्राकृतिक और अप्राकृतिक 
हादसों का भी साया  
ना पड़ सके ! 

अब तुम्हारे इरादों को 
इतना फौलादी कर देना 
चाहता हूँ !

कि वो इरादे चट्टानों 
का भी सीना फाड़ 
बंद हुए सभी रस्ते 
खोल सकने में सक्षम
हो सके !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...