Wednesday, 7 November 2018

उस रोज़ 'दिवाली' होती है !

उस रोज़ 'दिवाली' होती है ! 
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जब मन में हो मौज बहारों की
चमक आये चमकते सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे घेरते हों
तन्हाई में भी तेरी यादों के मेले हों,
उर में आनंद की आभा बिखरती है
मन में उजियारे की रोली फैलती है, 

उस रोज़ 'दिवाली' होती है ;

जब प्रेम-प्रीत के दीप जलते हों
सपने सबके जब सच होते हों,
मन में उमड़े मधुरता भावों की
और लहके फ़सलें लाड चावों की,
उत्साह उमंग की आभा होती है;
 
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब प्रेम से प्रीत मिलती हों
दुश्मन भी गले लग जाते हों,
जब किसी से वैर भाव न हो
सब अपने हों कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा फैलती हो; 

उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब तन-मन-प्राण सज जाएं
सद्-गुण के बाजे बज जाएं,
महक आये ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
हिय में तृप्ति की आभा फैलती है; 

उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

Tuesday, 6 November 2018

साफ़ और स्वच्छ प्राण वायु !

साफ़ और स्वच्छ प्राण वायु !
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सुनो दादू सुनो नानू 
सुनो काकू और मामू  
कल जब हम सब आएंगे
आपके बुलावे पर आपके 
ही आंगन तो क्या आप हमें 
वो साफ़ और स्वच्छ प्राण 
वायु दे पाएंगे जो साफ़ और 
स्वच्छ प्राण वायु आपको 
आपके दादू ने आपके नानू 
ने आपके काकू ने और आपके 
मामू ने दी थी और आप लोग 
अपनी-अपनी अम्मा अपने अपने 
अब्बू के अनुरागयुक्त निमंत्रण पर  
दौड़े चले आये थे फिर ऐसा क्या हुआ 
पिछले कुछ दशकों में की हमें निमंत्रण 
मिलने के बाद भी हम आपकी तरह दौड़े 
नहीं आ पा रहे है अपनी ही अम्मु और 
अपने ही अब्बू के उसी अनुरागयुक्त 
निमंत्रण पर बोलो ना दादू बोलो ना
नानू बोलो ना काकू बोलो ना मामू
क्या आप हमें दे पाएंगे वो प्राण वायु 
जिसमे हम भी आपकी तरह निष्फिक्र 
होकर वही प्राणवायु अपने इस शरीर 
को दे पाएंगे और गर आपको है कोई 
संशय तो अभी भी वक़्त है संभल जाईये 
और लजिए एक शपथ की इस दीपावली
आप इस प्राण वायु को और नहीं करेंगे 
प्रदूषित ताकि आपके ही पड़ोस में रहने 
वाले वो राजकुमार दादू और राजेश नानू  
दिव्यांश काकू और यशवंत मामू भी आपको 
देख कर इस प्राण वायु को फिर से वैसी  ही 
साफ़ और स्वच्छ बनाएंगे तभी फिर हम 
आपकी तरह दौड़ कर आपके आंगन की 
बगिया में आकर फिर से एक बार चहचहाएंगे ! 

Monday, 5 November 2018

शब्दों में पिरोता हु तुम्हे !

शब्दों में पिरोता हु तुम्हे !
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शब्द शब्दों में तलाशते है 
मुझे और मैं उन शब्दों में 
पिरोता हु तुम्हे जैसे रात 
होकर पत्तों सी टटोलती 
है खुद पर शबनम को और
चाँद जुगनू सा होकर मंद 
-मंद ढूंढता है अपनी चकोर 
को ठीक वैसे ही जैसे नदी 
खामोश किनारों को पकड़कर 
खल-खल बहती है खोजते हुए 
अपने अथाह समंदर को और 
दूर कंही संन्नाटों के जंगल में 
सुनाई देता है खनकते शब्दों 
का मध्यम शोर थके से किनारों 
की पगडंडियों के उस छोर पर 
तकते बढ़ते वो दो कदम जो 
अपने कदमो में मिलाकर मेरे 
कदम थामते है मुझे और मैं 
उन क़दमों में पा लेता हु तुम्हे 
फिर शब्द शब्दों में तलाशते है 
मुझे और मैं उन शब्दों में एक 
बार फिर से पिरोता हु तुम्हे !

Sunday, 4 November 2018

मैं तुम्हारे पास चला आता हु !

मैं तुम्हारे पास चला आता हु !
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तुमसे दूर जाने की बहुत सी 
वजहें थी मेरे पास और बहुत 
सी वजहें आज भी है मेरे पास; 

पर जब भी पहले प्यार का जिक्र 
होता है कंही भी तब तुम मुझे 
इस कदर याद आती हो की 
सबकुछ भुलाकर मैं दौड़ा-दौड़ा 
तुम्हारे पास चला आता हु,

तुमसे दूर जाने की बहुत सी 
वजहें थी मेरे पास और बहुत 
सी वजहें आज भी है मेरे पास; 

पर जब भी पहले प्यार पर लिखी 
लिखी खुद की कविता अकेले में 
गुनगुनाता हु मैं तब तुम मुझे 
इस कदर याद आती हो की 
सबकुछ भुलाकर मैं दौड़ा-दौड़ा 
तुम्हारे पास चला आता हु,
  
तुमसे दूर जाने की बहुत सी 
वजहें थी मेरे पास और बहुत 
सी वजहें आज भी है मेरे पास; 

पर जब जब निहारा खुद को 
आईने में मैंने तब-तब मेरी 
आँखों में छाया तुम्हारा वज़ूद 
देखकर तुम मुझे इस कदर 
याद आती हो की सबकुछ 
भुलाकर मैं दौड़ा-दौड़ा 
तुम्हारे पास चला आता हु,

तुमसे दूर जाने की बहुत सी 
वजहें थी मेरे पास और बहुत 
सी वजहें आज भी है मेरे पास; 

पर जब भी सोचा तुम्हारी 
वीरानियों के बारे में तब तुम 
मुझे इस कदर याद आती हो की 
सबकुछ भुलाकर मैं दौड़ा-दौड़ा 
तुम्हारे पास चला आता हु!

Saturday, 3 November 2018

यौवन ही जीवन है !

यौवन ही जीवन है !
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यौवन शक्ति है 
यौवन शिक्षा है 
यौवन समृद्ध है 
यौवन ख़ुशी है 
यौवन प्यास है
यौवन तृप्ति है 
यौवन उपहार है 
यौवन विश्वास है 
यौवन सुन्दर है
यौवन सपना है 
यौवन कर्म है 
यौवन धर्म है
यौवन आशा है 
यौवन वादा है
यौवन संरक्षक है 
यौवन जीवन है 
यौवन प्रवाह है
यौवन बीज है 
यौवन बिंब है 
यौवन यज्ञ है 
यौवन स्वतंत्र है 
यौवन प्रेम है 
यौवन भोग्य है
यौवन सार है 
यौवन प्रेम है 
यौवन ही कारक है
यौवन ही श्रृंगार है  
यौवन ही शिव है !  

Friday, 2 November 2018

कोई भी रिश्ता टूटता नहीं !

कोई भी रिश्ता टूटता नहीं ! 
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कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता यंहा 
कोई भी रिश्ता टूटता नहीं यंहा

रिश्ता या तो जीता है यंहा
या फिर रिश्ता मरता है यंहा 

पर कोई भी रिश्ता टूटता नहीं यंहा
चाहे बातें बंद हो जाये यंहा की वंहा की   

चाहे मुलाकातें खत्म हो जाये यंहा
या फिर एक नज़र देखना भी फिर 
गंवारा ना रह जाये एक दूजे को यंहा  

पर रिश्ता हमेशा कंही ना कंही 
अपनी सांसें लेता रहता है यंहा 

उन सांसों की बदौलत ही रिश्ता 
कंही ना कंही बना रहता है यंहा 

जीते जी आमने-सामने रहता है
मरने के बाद मन में कंही ना कंही

या स्मृति में या फिर यादों में कंही 
और कुछ नहीं तो आहों में यंहा 

पर रिश्ता रहता है मौजूद यंहा 
कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता यंहा 
हाँ व्यर्थ नहीं जाता कुछ भी यंहा !

Thursday, 1 November 2018

मैंने तो सिर्फ प्रेम किया !

मैंने तो सिर्फ प्रेम किया !
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प्रेम तो किया था मैंने तुमसे 
अपनी आँख और दिमाग 
दोनों बंद कर के;

जबकि कई बार मेरी 
इन्द्रियों होकर सक्रिय 
जताती रही विरोध;

तभी तो करता रहा मैं   
नज़रअंदाज़ विरोध 
अपनी ही इन्द्रियों का;

क्योंकि मैंने तो पढ़ा था 
प्रेम में कभी तार्किक नहीं 
हुआ जाता;

और मैं कभी हुआ भी नहीं 
परन्तु तुमने तो कभी कोई 
बात मेरी मानी ही नहीं;

जब-तक की तुमने उस बात
को आज़माया नहीं क्योंकि
तार्किक हो तुम;

पर क्या तुमने कभी पढ़ा नहीं
या सुना भी नहीं की प्रेम में कभी
किसी तरह के तर्क की कोई जगह 
नहीं होती;

इसलिए मैंने अपने हिस्से का 
प्रेम किया और तुमने अपने 
हिस्से का तर्क;  

प्रेम तो किया था मैंने तुमसे 
अपनी आँख और दिमाग 
दोनों बंद कर के !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...