Sunday, 7 October 2018

तेरे दम की मुझे सांसें दे !

तेरे दम की मुझे सांसें दे !
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मेरी ज़िन्दगी मेरे साथ चल ,
तू थाम कर मेरे ख्वाब चल ,
मेरे हाथ में अपना हाथ दे ,
मेरी उम्र भर मेरा साथ दे ,
तुझे चाहना ही मेरी आरज़ू ,
तुझे देखना ही मेरी जुस्तजू ,
मुझे दिन दे अपने ख्याल का ,
मुझे अपनी उर्मा की रातें दे ,
अपने समर्पण की सांसें दे
तेरे दम से सांसें हो रवां मेरी ,
मुझे उलझनों से निजात दे ,
मेरी ज़िन्दगी तू अब मेरी 
हर साँस में मेरा साथ दे, 
मेरी ज़िन्दगी मेरे साथ चल ,
तू थाम कर मेरे ख्वाब चल

Saturday, 6 October 2018

ये तुम्हारी जिम्मेदारी थी !

ये तुम्हारी जिम्मेदारी थी !
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वो सिर्फ तुम्हारी 
ही ऑंखें थी जिसने 
भेद दिया था मेरी 
आत्मा पर लगे उस 
बड़े से दरवाज़े को   
जिस पर बड़े-बड़े 
अक्षरों में लिखा था
अंदर आना सख्त 
मना है पर तुम्हारी 
आँखों ने भेद ही दिया 
था उस दरवाज़े को तो
फिर ये तुम्हारी जिम्मेदारी 
थी की उस दिन के बाद
मैं कभी अकेला ना रहु 
पर फिर तुमने ऐसा क्यों 
किया की दरवाज़ा भी खोला
अंदर भी आयी पर जाते वक़्त 
दरवाज़ा खुला छोड़ कर चली गयी 
कोई जिम्मेदार ऐसे कैसे अपने घर 
के दरवाज़े किसी के लिए भी खुला 
छोड़ कर जा सकती है बोलो !

Friday, 5 October 2018

सांझ बनेगी सुहानी रात

सांझ बनेगी सुहानी रात
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मेरे प्रेमातुर मन में 
जैसे साँझ ढल रही है
एक किरण रोशनी की 
मुझे प्यार से झिड़कती है 
रूककर और मुझसे कहती है  
क्यों तुम इतनी जल्दी उम्मीद
का दामन छोड़ रहे हो पागल 
तुम देखना अभी तो साँझ के 
ऊपर छायेगा चाँद और ये साँझ
चाँद की आगोश में समाकर पूरी
की पूरी रात सुहानी हो जाएगी 
उसके बाद छायेगा उजाला एक 
नयी सुबह का फिर तुम्हारी प्रिय 
आएगी तुम्हारे पास तब यही 
तुम्हारा प्रेमातुर मन फिर से 
उसके प्रेमानंद में डूब जायेगा 
सुन उस किरण की ये बातें 
मैं भी देखने लग जाता हु 
कैसे चाँद सांझ को अपने
प्रेम में डुबाकर सुहानी रात
बनता है ताकि आज जब वो
आएगी तो मैं भी उस सुबह को
रात बनाकर रख लूंगा सदा के 
सदा के लिए मेरे ही पास ! 

Thursday, 4 October 2018

कितना सहज सोच लिया था मैंने

कितना सहज सोच लिया था मैंने
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तुम अक्सर ही यूँ जो दो-चार 
कदम मुझसे आगे चलती थी  
जब भी मैं होता था तुम्हारे साथ 
एक दिन यु बिन बताए अचानक
ही मैं अपने दो-चार कदम तेज़ 
चलकर ज्यों ही तुम्हारा हाथ  
थाम लूंगा तो कितना सहज हो 
जायेगा सबकुछ हां सबकुछ ही 
जैसे हमारी चीज़ें हमारे लोग 
और मेरे वो अलफ़ाज़ भी जो 
अक्सर तुम्हे मेरी जिव्हा पर 
कठोर तीखे और बेरुखे लगते थे 
लेकिन मुझे नहीं पता था वो 
मेरा यु तुम्हारा हाथ पकड़ना 
तुम्हे इतना अखर जायेगा की
फिर कभी तुम वैसे ही दो-चार 
कदम आगे चलने के लिए भी 
मेरे साथ तैयार ना होगी और 
देखो मैं इसे ऐसे कैसे इतना 
सहज सोच लिया था है ना !   

Wednesday, 3 October 2018

तेरा भूरा-भूरा सा इश्क़


तेरा भूरा-भूरा सा इश्क़ 

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वो भूरी-भूरी सी लहरें 
खिंच ले जाती है मुझे
उन भूरी-भूरी आँखों की
भूरी-भूरी सी गहराईयों 
में मुझे अब क्यों कोई 
और रंग नहीं भाता मुझे
एक तेरे इस भूरे रंग के 
सिवा वो ही भूरी-भूरी सी 
लहरें एक दिन कब मुझे 
अपने प्रेम के भूरे-भूरे से 
ही समंदर में खिंच ले गयी 
पता ही ना चला वो भी तब 
जब मेरे पास नहीं था प्रेम 
का कोई भी अनुभव और  
ना ही थी पास कोई नाव 
हां बस इतना ही कहा था 
लो थाम लो मेरा हाथ तुम 
मैं तो सर से पांव तक बस 
चाह ही चाह थी अब तुम्हारी 
और उसी चाह में अब डूबी हु
और अब उसी समंदर के अंदर
पानी के निचे साँस भी ले रही हु मैं  
उन भूरी-भूरी सी लहरों में डूब रही हु मैं ! 

Tuesday, 2 October 2018

ज़िन्दगी के छोटे-छोटे दिन


ज़िन्दगी के छोटे-छोटे दिन
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इस लम्बी सी जिंदगी 
के ये छोटे-छोटे से दिन
के ये छोटे-छोटे से पल 
और ये छोटे-छोटे से पल 
के छोटे-छोटे से पल छण
रूक जाते और कुछ पल
के ये छोटे-छोटे से दिन 
पर दिनों को भी चलने की
की जो आदत है जन्मो से 
शायद इसलिए चलते चलते 
बितते रहते हैं यु ही ये दिन
कभी किसी के साथ तो कभी
किसी के बिन बीतते रहते हैं
ये छोटे-छोटे से दिन और दिन
के ये छोटे-छोटे से पल और
ये छोटे-छोटे से पल के छोटे
छोटे से पल छण रूक जाते 
पर आज तुम जो साथ हो तो 
ये सिर्फ वक्त ही बन बीतेगा  
घड़ी की सुइयां बन चाहे तो 
तू सुन कान बन इसके सुर 
लेकिन तुम्हारे साथ ठहरा 
मेरा ये दिन मेरी पूरी जिंदगी 
बन ठहरा रहेगा साथ मेरे मेरा 
ये दिन मेरी पूरी जिंदगी बन
साथ लेकर अपने ये छोटे-छोटे 
से पल और ये छोटे-छोटे से पल 
के छोटे छोटे से पल छण मुझमें
ही कंही तुम्हारे साथ यूं ही संग 
मेरे हर पल हर क्षण ये दिन 
साथ साथ मेरी सांसों के यूं ही 
धक धक कर कर एक दिन 
धड़कन बन मेरी रूक जाएगा 
ये दिन और दिन के छोटे-छोटे
से पल और पल के छोटे-छोटे 
से ये पल छण एक दिन ।

Monday, 1 October 2018

तुम ही मेरी गति हो

तुम ही मेरी गति हो
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तुमने ठीक ही कहा था 
तुम्हारी चाह के बाहर
मेरा कोई जीवन नहीं 
तुम ही मेरी गति हो
तुम्हारी बांहों के घेरे 
के बाहर मेरे किसी 
सामर्थ का अर्थ नहीं
मेरे सारे आयाम तुम
ही हो और तुम्हारे कोने
तुम्हारे वृत्त और रेखाएं 
से ही मेरे समस्त जीवन 
की अभिलाषाएं जुडी है
जिस दिन तुमने प्रवेश 
किया था मेरी हथेलियों
की रेखाओं में उसी दिन 
प्रवेश पा लिया था मेरी 
आबध्ताओं में और जिस 
दिन तुम दूर चली जाओगी 
उस दिन मेरे जीवन का  
आशय समाप्त हो जायेगा है 
हां तुमने ठीक ही कहा था 
तुम्हारी चाह के बाहर...

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...