Wednesday, 12 October 2022

शिकायत !

तुम अपनी शिकायतों 

का सिलसिला यूँ ही 

जारी रखना सदा, 

क्यूंकि मैंने देखा है 

तुम्हारी शिकायतों 

के पीछे छुपी उम्मीदों 

को बड़ी आस से मुझे 

टुकटुक देखते हुए, 

उन्हें देख कर लगता 

है कि कुछ शिकायतें 

सदा बनी रहनी चाहिए !



Friday, 4 February 2022

सही वक़्त!

 उसके सही वक़्त 

के इंतज़ार में मेरी 

ज़िन्दगी गुजर रही है 

रफ्ता रफ्ता 

वो बैठा सोच रहा 

समय उसे छू कर 

गुजरे जा रहा 

जब तक सही 

वक़्त आएगा 

वक़्त के निशां 

चेहरे पर नज़र 

आ ही जायेंगे 

तब गीली पलकों 

को क्या छुअन 

की सिरहन पोंछ 

पाएंगी !

Wednesday, 29 December 2021

मिलन की रुत !

 मिलन की रुत से

विरह के दिनों तक
का फासला कितना
लम्बा है

और वो फ़ासला
कुछ ऐसा है जिसको
उम्र का अंतराल भी
तय न कर पाता है

विरह की रुत खत्म
होने तक कहीं ऐसा
ना हो कि आरज़ू ही
मर जाए

आहों के चौराहे का
मंज़र क्षत विक्षत हैं
जिन्हे देख कर ऑंखें
भीगी ही रहती है

आइने से कहती है
किस लिए सँवरती हों
क्यूँ श्रृंगार करती हूँ

क्यूँ उस अजनबी
मुसाफ़िर का मैं
इंतिज़ार करती हूँ

क्यूँ रोज़ रोज़ जीती हूँ
क्यूँ रोज़ रोज़ मरती हूँ !

शब्दांकन © एस आर वर्मा

Tuesday, 28 December 2021

प्रेम के प्यासे !

 सीढ़ियाँ आसमान की चढ़ के

चाँद के एक एक कोने में
मोहब्बत को तलाशते है

और सूरज के सहरा में
दो बूंद पानी की ख़ातिर
मोहब्बत अपनी एड़ियाँ
रगड़ती है

फिर प्रेम के प्यासे
लोग सिसक के अपना
दम तोड़ देते हैं !

शब्दांकन © एस आर वर्मा

Saturday, 18 December 2021

एक रोज़

एक रोज़ जब
मैंने सज्दे से
सर उठाया
तो देखा वो
वहां था ही नहीं
जिसको मैं जाने
कब से पूज रही थी
फिर मैंने सोचा
इस से क्या फ़र्क़
पड़ता है कि वो
वहां है की नहीं
इस से मेरी इबादत'
थोड़ी न व्यर्थ जाएगी !
©SRAMVERMA

Monday, 15 November 2021

पूरी ज़िन्दगी !

 पेट भर खाना 

सोने को बिस्तर 

थोड़ी सी मोहब्बत 

ढाई गज चादर'

और एक चुटकी इज़्ज़त 

के बदले लगभग इस 

संसार की सभी औरतों  

ने अधूरे पुरुषों को भी

अपनी पूरी ज़िन्दगी  

बना ली है !

Monday, 8 November 2021

ग़ज़ल

 


जिनको अपने दिल में जगह दो "राम",

वो अगर दिल दुखाते है तो दुखाने दो ;


एक दिन वो भी समझेंगे इस दर्द को ;

उनके दिल को भी तो कभी दुखने दो !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...