Friday, 31 May 2019

प्रीत सवाल करती है !


कई सवाल मचलते हैं हर जवाब के बा'द ,
तेरे ख्याल से पहले और तेरे ख्याल के बाद ; 

ना जाने क्यूँ ये मेरा दिल धड़कने लगता है ,
तेरे आने से पहले और तेरे जाने के बाद ;

तेरी हर एक चाल से वाक़िफ़ थी ऐ मेरे हमदम , 
तेरे हर एक दाव से पहले हर एक दाव के बाद ; 

ना जाने क्यूँ तेरी यादें जीना मुहाल करती हैं ,
मेरे साँस लेने से पहले साँस लेने के बा'द ;

तेरी क़सम तेरा चेहरा ही रू-ब-रू था मेरे , 
तेरे मिलने से पहले तेरे मिलने के बा'द ;

कहाँ थे एक से हालात मेरे दिल-ओ-जाँ के , 
तेरा मेरे होने से पहले तेरा मेरा होने के बाद ;  

दिल-ए-नादाँ उसे याद कर जो साथ रहे ,
तेरे ज़वाल से पहले तेरे ज़वाल के बा'द ;

एक प्रीत ही मुसलसल सवाल करती है ;
प्रेम पाने से पहले और प्रेम पाने के बा'द !

Thursday, 30 May 2019

मैं तो उसके पास थी !


बहकी हुई नज़र थी लेकिन फिर भी उदास थी ,
मय तो दूर थी उस से मगर मैं तो उसके पास थी ;

बे-शक उसने बुलाया जिसे वो रूठी हुई एक रूह थी ,     
मगर शिकस्त-ए-दिल में मेरे ज़िंदा मगर एक आस थी ;

गर तू मेरे दिल-ओ-दिमाग पर छाया हुआ न था ,
तो वो हस्ती कौन थी जो मेरे दिल में समायी थी ;

अक्सर बारिशों में पेड़ों के पत्ते तो धुल ही जाते है ,  
मगर धरती कोख़ में अभी भी हरियाणे की प्यास थी ; 

कोंपलें जब भी आँख खोलती है तो क्या देखती है ,
उनकी हद्द-ए-नज़र तलक उनकी ये ज़मीं बे-लिबास थी ; 

दिल में एक ताज़ा खिला हुआ गुलाब था ,
मगर आँखों में सारी तमन्नाएँ उदास थी ;

इन दिनों मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ ,
वो कौन था जिस के लिए मेरे दिल में प्यास थी ! 

Wednesday, 29 May 2019

इश्क़ और मोहब्बत !


तेरे साथ चलती हूँ तो जहान साथ आता है ,
जब तुझ से दूर रहती हूँ तो जहान खाने को दौड़ता है ;  

मेरे दर्द के हवाले से कितना बा-ख़बर है वो ,
मेरे बिन बहाए ही वो मेरी आँखों के आँसू चुन लेता है ; 

तीख़ी धूप ही तो मिलती है ज़र्द ज़र्द मौसम में ;
कल किसने कहा की तीख़ी धूप में मोहब्बत निखर जाती है ; 

तू ही बता ख़ाक-ए-दिल तुझे ले कर अब कहाँ कहाँ जाऊँ ,
हूँ तो मैं ज़मीं की मगर दिल आसमान पर आता क्यों है ;

मैं हिज्र के सातों समुंदर को पार कर के आई हूँ ,
गर अब भी तू ना मिला तो मरने का ख्याल आता है ; 

जब अदा-ए-वहशत के मिज़ाज़ पर मैं चलती हूँ ; 
तो गुलों से भरा सारा गुलिस्ताँ मुझ से रूठ जाता है ,  

नज़्म में मेरी जब भी ये जहान उसको देखता है ,
इश्क़ और मोहब्बत से चिढ़ने वाला ये जहान जल-भून जाता है !

Tuesday, 28 May 2019

मैं हिद्दत में जलने लगी हूँ !


प्रेम के बीज फिर बोने चली हूँ 
तुम्हे तुम्हारा तुम लौटाने चली हूँ 

जुनूँ की ओर अपने क़दम बढ़ाने चली हूँ 
कली से अब मैं फूल होने चली हूँ  

ये मुमकिन तो नज़र आता नहीं है 
मैं ना-मुमकिन को मुमकिन करने चली हूँ 

समंदर आ गया मेरे मुक़ाबिल है 
जब उस ने देखा मैं सूखने चली हूँ 

यही नेकी मुझे ज़िंदा रखती है 
कि बोझ मैं अपनों का ढोने चली हूँ 

मुज़्तरिब ख़ुद को पा कर भी रहती हूँ  
यही सोच कर अब मैं खुद को खोने चली हूँ 

तेरी याद आँखों में मेरी उतर आई है 
तुझे पाने के लिए मैं अब सोने चली हूँ 

खुद की हिद्दत में अब मैं जलने लगी हूँ 
तेरे प्रेम की झमाझम बारिश में नहाने चली हूँ !

Monday, 27 May 2019

मेरा चाँद सोता नहीं है !


हिज़्र की शब है फिर भी पूरा चाँद है  
दुःख है भरा पूरा और चाँद अधूरा है 

जैसे ही रात हुई और निकल आया चाँद है 
जैसे ही दिन हुआ और छुप गया चाँद है 

सोचो कैसी वहशत से गुजरा चाँद है 
तभी तो इतना सहमा सहमा हुआ चाँद है 
  
किसकी यादों की गलियों में आज चाँद है 
फिर भी तंहा अकेले घूम रहा उदास चाँद है 

सोचो नींद का कितना कच्चा ये चाँद है  
तारों की करवटों पर जाग उठता चाँद है 
  
सब ने कहा इसे ये भोला भाला चाँद है 
हर किसी की महबूबा को ताक रहा चाँद है 

किस किस के आँसुओं में नहाया चाँद है 
दिल दरिया सा तन सहरा सा  चाँद का है 

अपने इश्क़ में कितना सच्चा चाँद है 
आज भी चकोर के पीछे भाग रहा चाँद है 

आधी रात को भी जागता मेरा भी चाँद है 
तभी तो आज कल सोता नहीं मेरा चाँद है !

Sunday, 26 May 2019

तेरा दिल बड़ा है !


एक मंज़िल और अलग अलग रास्ते है ,
ये ज़िन्दगी भी कितनी आसान और कठिन है ;

वो अगर मुझे अपना कुछ समय देता है ,
ये करम उसका क्या कुछ ज्यादा है ;

जो रुके हुए है वो सारे वो घुड़सवार है , 
जो चल रहे है वो सारे के सारे प्यादे है ;

शिद्दत-ए-दिल से पुकारना तुम मुझको ; 
लौ आऊंगा मैं ये मेरा तुमसे वादा है ,

फिर जो करने लगा तू नए नए वादे है ,  
ये तो बता तू क्या फिर से मुकरने का इरादा है ;

दुनिता का हौसला आजकल बड़ा तंग है ,
मैंने सुना है तेरा दिल कहीं ज्यादा बड़ा है !

Saturday, 25 May 2019

तुम्हारे इश्क़ की बूंदें !


तुम्हारे इश्क़ की बूंदें !

मैंने तो गुजारिश की है , 
बस एक बून्द इश्क़ की ,
एक सिर्फ मुझे ही पता है ;
कीमत इस एक बून्द की !
कितना कुछ मुझे देती है  
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें 
मुझको हमेशा रखती है 
पूरी तरह तर-बतर 
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें 
तुम्हारे प्रेम का अंश है
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें 
तुम्हारा प्यार बनती है 
तभी तो मुझे छूती है 
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें
तुम्हारे जज्बात बनती है 
फिर कितना कुछ कहती है     
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें 
मेघ मल्हार बनकर बरसती है
तभी तो मैं हरी-भरी तुम्हारे 
प्रेम की चादर ओढ़ती हूँ   
तुम्हारे इश्क़ की ये बूंदें 
कितना कुछ मुझे देती है !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...