Wednesday, 7 August 2019

जज्बाती दरिया !


जज्बाती दरिया !

एक दरिया मेरे 
महकते जज़्बातों का
वो उमड़ता है तब 
जब ज़िक्र तेरा मेरे 
कानों से गुज़रता हुआ 
सीधे जा पंहुचता है 
दिल की रसातल में 
इस जज़्बाती दरिया ने 
कभी तुझे निराश किया हो 
ये भी मुमकिन है 
क्योंकि तेरे लिए ही
दरिया का बहना अब 
बन गयी है इसकी नियति
पर इतना याद रखना
कंही सुख ना जाये 
ये जज़्बाती दरिया 
तेरी प्यास बुझाते बुझाते
रह जाए बस इसमें कुछ 
तुम्हारे फेंके पत्थर 
और तुम्हारे तन से 
निकली मटमैली धूल 
और कुछ ना बचे इसमें 
तुम्हारे कुछ अंश के सिवा !

Monday, 5 August 2019

दिल की गुस्ताखी !


दिल की गुस्ताखी !

गुस्ताखी तो देखो दिल की मेरे चाहता है , 
रहना साथ उसके ही सदा ; 
जो मुझे सिर्फ अंधेरो में मिलना चाहती है !
वो चाहता है मुस्कान बनकर उसके ही 
होंठो पर रहना सदा ; 
जो हंसती है अपना दरवाज़ा बंद कर के सदा !
वो चाहता है रहना बनकर सुरीला संगीत , 
उसके ही कानो में सदा ;
जो प्रायः संगीत को आँखों से सुनती है !
वो चाहता है बनकर यौवन की मदहोश , 
खुश्बू उसके ही नथुनों में ;
जो अक्सर मेरे तन की खुश्बूं मिटाकर ; 
ही मिलती है सबसे सदा !
वो चाहता है बनकर रहना उसके कंठ में , 
कोयल की सुरीली आवाज़ बनकर ; 
जो अक्सर गुमसुम रहना पसंद करती है !
वो चाहता है रहना उसके हृदय में अप्रितम ,
चाहत बनकर जो चंद जिम्मेदारियों के अलावा ; 
कुछ और रखना ही नहीं चाहती अपने दिल में !
वो चाहता है बनकर सिन्दूर रहना उसी एक , 
अपनी प्रियतमा की मांग का ; 
जो अक्सर बिना सिन्दूर रहना पसंद करती है ! 
गुस्ताखी तो देखो दिल की मेरे चाहता है , 
रहना साथ उसके ही सदा ; 
जो मुझे सिर्फ अंधेरो में मिलना चाहती है !

Sunday, 4 August 2019

हवन की समिधा !




तुम्हारे प्रेम क्षुधा से 
व्याकुल मेरा हृदय 
तृप्ति की चाह सिर्फ 
एक तुम से रखता है ;

मेरे मन में जबसे तुम 
हुई हो शामिल ये दिल 
जिद्द पर अड़ा है बनने 
को तुम्हारे हवन कुंड 
की समिधा है ;

जो हर एक आहुति के 
साथ धधक कर पूर्ण 
होना चाहता है सुनते 
ही स्वाहा ;

ताकि तुझमे मिलकर 
प्रेम की समिधा सा वो 
हो जाए पूर्ण और मेरे 
मन की व्याकुल क्षुधा 
को यज्ञ की पूर्णाहुति के 
साथ चीर शांति मिले !

क्यों इतने सारे क्यों है !


क्यों इतने सारे क्यों है  !

क्यों रात की ये कालिमा है
क्यों रौशनी से तपता दिन है 
क्यों आसमा ही ओझल है
क्यों हवा सूखी और मद्धम है 
क्यों लम्हे दर-दर बिखरे हैं
क्यों यादों के प्रतिबिम्ब धुंधले है 
क्यों आँहे कराहें हो रही है 
क्यों दिन बीत ही नहीं रहे है 
क्यों एक नयी सुबह की ख़्वाहिश है
क्यों अब लेटे रहना भी मुश्किल है 
क्यों अकेले चलते रहना अब भारी है
क्यों भटके भटके से ये पदचिन्ह है 
क्यों हर एक पल आँखों से ओझल है
क्यों परछाइयाँ एक ही दुरी पर अडिग है 
क्यों अब सारी तस्वीरें चुभती सी हैं
क्यों सिमटे जीवन अब प्रतिदिन है  
क्यों सिर्फ एक तेरे साथ न होने से 
कितने कुछ पर क्यों लग रहा है ! 

Saturday, 3 August 2019

गवाह बनना चाहता हूँ !


मैं चाहता हूँ बनना गवाह 
हमारे उन्मुक्त देह-संगम का 
मैं चाहता हूँ बनना गवाह 
उस परिवर्तन का जिसमे 
परिवर्तित होते देख सकूँ  
एक हिरणी को सिंघनी होते 
मैं चाहता हूँ बनना गवाह
प्रथम छुवन के स्पंदन का 
जो अभिव्यक्त कर सके 
तुम्हारी इंतज़ार करती 
धड़कनो की गति को 
मैं चाहता हूँ बनना गवाह
तुम्हारी तपती देह की से 
उठती उस तपन का जो 
पिघला दे लौह स्वरुप मेरे 
मैं को अपनी उस तपन से 
मैं चाहता हूँ बनना गवाह 
तुम्हारे होठों को थिरक थिरक 
कर यु बार बार लरजते देखने का 
मैं चाहता हु बनना गवाह
तुम्हारी उष्ण देह से निकलती 
कराहों को अपने कानो से सुनकर 
अपनी आँखों से देख सकूँ  
ठन्डे होते उसी तुम्हारे उष्ण 
देह को जिससे निकले तृप्ति 
का वो कम्पन जिसे पाकर 
तुम हो जाओ पूर्ण !

Friday, 2 August 2019

कवितायेँ !


कवितायेँ !

कविताये समेटती है 
हमारे प्यार व तकरार के पल 
कविताये समेटती है 
पहली मुलाक़ात की ख़ुशी 
व जुदाई का दर्द भी 
कविताये समेटती है 
मोहब्ब्त के रंग और 
अभिव्यक्ति के ढंग भी 
साथ साथ समेटती है 
एक दूजे के द्वारा की 
गयी मनुहार व इकरार भी 
कविताये समेटती है 
कभी करार तो कभी 
इन्कार भी कभी स्वीकार 
तो कभी अंगीकार के पल भी 
कविताये समेटती है 
दिल ए बयान जिसमे 
रंग बदलती स्वांग रचती 
ख्वाब बुनती तो कभी 
चुनती है किरचें भी 
कविता का हर सफहा होता है 
दिल का आईना
हर लफ्ज़ होता है 
रूह की फरियाद !

Thursday, 1 August 2019

सफर का हमसफ़र !


जब हो जाये किसी को प्रेम अपने , 
ही प्रतिबिम्ब से डरने वाली से ;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस प्रेम के ,
सफर का हमसफ़र हो जाता है ;

जब हो जाये किसी को प्रेम अपनी ,
ही सांसों की तेज़ गति से डरने वाली से;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस प्रेम के ,
सफर का हमसफ़र हो जाता है ;

जब हो जाये किसी को प्रेम अपनी , 
ही पदचाप की आवाज़ से डरने वाली से ;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस प्रेम के ,
सफर का हमसफ़र हो जाता है ;

जब हो जाये किसी को प्रेम अपनी ,  
ही दहलीज़ को पार करने से डरने वाली से ;

तो दर्द खुद-बा-खुद उस प्रेम के ,
सफर का हमसफ़र हो जाता है ;

और जब दर्द किसी प्रेम के सफर , 
का हमसफ़र हो बन जाता है ;

तो आँसुओं को देनी पड़ जाती है इज़ाज़त , 
आँखों के काजल को बहा ले जाने की ! 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...