Friday, 7 June 2019

राजकुमारी मेरी आँखें !


कितनी शिद्दत से तुम्हे पुकारी थी मेरी ऑंखें ,
ख़्वाबों के बिखर जाने से हार गयी मेरी आँखें ;

दीपों की भांति सारी रात जागती मेरी आँखें ,
नींदों के शबिस्तान में भारी भारी मेरी आँखें ;

तन्हाई में भी कितने ख्वाब सजाती है ऑंखें , 
बुझ सकती नहीं रंज की मारी मेरी आँखें ;

तुम्हे इस मकां की मकीं बनाने की खातिर ,  
शबनमी हुई और भी प्यारी ये मेरी आँखें ;

एक तेरी ज़ियारत से छलकता है उजाला इसमें ,
एक तेरे सुर्मा-ए-मंज़र ने निखारी मिरी आँखें ;

सपनों के तख़्त-ओ-ताज पर बैठी है ,
ऐसे की जैसे राज-कुमारी हो मेरी आँखें ;

हिज़्र के मौसमों ने भी अपना फ़र्ज़ निभाया ;
उसने अश्कों के सितारों से सँवारी मेरी  आँखें !

Thursday, 6 June 2019

लहजे को नर्म करो !


इश्क़ को यूँ आत्मसात करो ,
ख़त्म तुम अपनी ज़ात करो ;

इश्क़ से जब मिलने जाओ ,
पहले ख़ुद को तुम तैयार करो ; 

दिन भर खुद के साथ रहो , 
इश्क़ में बसर अब रात करो ; 

रात की ज़ुल्फ़ सँवर जाए ,
गर हिज्र को तुम वस्ल करो ;

इश्क़ को तुम दिल में बसाओ ,  
फिर उसकी धड़कनों पर कब्ज़ा करो ; 

मुझ पर कुछ ऐसे प्यार लुटाओ ,
बंजर जमीन पर जैसे बरसात करो ;

बात हो जब भी इश्क़ के बारे में , 
अपने लहजे को तुम थोड़ा नर्म करो ; 

उम्र की पूँजी यूँ ही ख़त्म ना हो ,
कुछ कम खर्च तुम इसे उस पर करो ; 

नयनों का अमृत चखने के लिए , 
तर्क सभी तुम आज़माया करो !

Wednesday, 5 June 2019

प्रीत और प्रेम !


प्रीत और प्रेम !

प्रीत प्रेम को गुनगुनाती रही 
और मैं गीत की धुन बनाती रही

प्रीत प्रेम के विरह में जलती रही 
और मैं उसकी आंच में जलती रही 

प्रीत प्रेम को चुपचाप बुलाती रही 
और मैं उनकी नींद के पर बनाती रही

प्रीत प्रेम से अँखियाँ लड़ाती रही
और मैं अपने आप में मुस्कुराती रही 

प्रीत प्रेम की हिद्दत में जलने का सोचती रही
और मैं आंच की कमी को सर उठाते देखती रही 

प्रीत प्रेम पर अपना प्यार लुटाती रही 
और मैं अकेली अपना फ़र्ज़ निभाती रही 

Tuesday, 4 June 2019

राही जीवन पथ का !


राही जीवन पथ का !

जब तक चलेगी ज़िन्दगी की साँसें ,
कहीं प्यार तो कहीं तकरार मिलेगा ;
कहीं बनेंगे सम्बन्ध अंतर्मन से तो ,
कहीं आत्मीयता का आभाव मिलेगा ! 

कहीं मिलेगी ज़िन्दगी में प्रशंसा तो ,
कहीं नाराजगियों का पहाड़ मिलेगा ;
कहीं मिलेगी सच्चे मन से दुआ तो ,
कहीं भावनाओं में भी दुर्भाव मिलेगा !

कहीं बनेंगे पराये रिश्ते भी अपने तो ,
कहीं अपनों में ही खिंचाव मिलेगा ;
कहीं होगी ख़ुशामदें चेहरे पर तो ,
कही पीठ पर छुरे का घाव मिलेगा ! 

तू चलता रह राही जीवन पथ पर ,
जैसा भाव वैसा तुझे प्रभाव मिलेगा ;
रख स्वभाव में शुद्धता का स्पर्श तू ,
अवश्य मनचाहा तुझे पड़ाव मिलेगा !

Monday, 3 June 2019

एक बूंद हूँ !


एक अदना बूंद 
सी पहचान रखता हूँ
बाहर से शांत हूँ
मगर अंदर एक 
तूफान रखता हूँ
रख के तराजू में 
अपने प्यार की 
खुशियाँ दूसरे 
पलड़े में मैं अपनी 
जान रखता हूँ
किसी से क्या उस 
रब से भी कुछ नहीं 
माँगा अब तक मैंने  
मैं मुफलिसी में भी 
नवाबी शान रखता हूँ
मुर्दों की बस्ती में 
ज़मीर को ज़िंदा 
रख कर ए जिंदगी 
मैं तेरे उसूलों का 
मान रखता हूँ ! 

Sunday, 2 June 2019

बारिश की बूंदें !


मन में कितनी उमंगें जगाती है , 
ये बारिश कितना कुछ कहती है ;  

अनगिनत सुनहरे ख़्वाब सजाती है , 
जब भी मैं इसकी बूंदों में नहाती हूँ ;

कितना कुछ ये मुझमे बोती रहती है , 
मुझे स्त्री होने का एहसास कराती है ;

रोज कितना कुछ नया सिखाती है , 
मुझे नाज़ उठाना सिखाती रहती है ;

मेरे रोम-रोम को झंकृत करती है ,
संगीत और साज़ बजाती रहती है ;

अपनी बूंदों की मनमानियों से , 
मेरे रोम रोम में आग लगाती रहती है ;

मेरे लबों पर ये दुआ पिया की सजाती है , 
प्रेम प्रीत की ये जोत जगाती रहती है ;

मन में कितनी उमंगें जगाती है ,
ये बारिश कितना कुछ कहती है ! 

Saturday, 1 June 2019

मोहोब्बत जमीं की !


क्योँ भागती-दौड़ती सी ज़िन्दगी रुकी हुई है ,
क्या ये मेरे लिए ही रुकी हुई है ;

परछायी को तो कब का विदा कर दिया गया है ,
फिर देह क्योँ अब तक वहीँ रुकी हुई है ;

आँखों से ना-उम्मीद होकर के ख़्वाबों की ताबीर ,
पलकों की नम कोरों पर रुकी हुई है ;

बारिशों का लिहाज़ करती है ये हवाएं ,
वो यूँ ही तो नहीं रुकी हुई है ;

मैं आने वाले कल से मिल आया हूँ ,
दुनिया को देखो यहीं रुकी हुई है ;

इश्क़ आसमां का होकर भी जमीं पर उतर आया है ,
मोहोब्बत जमीं की होकर भी दहलीज़ के अंदर रुकी हुई है !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...