Thursday, 7 December 2017

सांसों की डोर


लपेट दी है मैंने
अपनी सांसों की डोर ,
तुम्हारे चारों और
तुम्हारा ही नाम
जपते हुए तुमसे ही
छुपाकर बांध दी है,
अपनी सांसों
की डोर मज़बूती
से उन सभी गांठों में
की अब तुम मेरी
ज़िन्दगी पूरी होने
के पहले चाहकर भी
नहीं खोल पाओगी,
इन गांठों को बिना मेरी
सांसों की डोर को काटे हुए  ;

प्रेम की सौगात

जो न होता कुदरत में
सूरज का ताप 
और बादलों की 
नमी का नजारा
धरती का आँचल
रहता सदा बदरंग सा 
दिल में जलती
सूरज सी आग
नयनों से टिप टिप 
करती बरसात
कुदरत के रंग सी
ही तो होती है 
लेकिन शायद 
कहने और करने की
सारी हदें टूट जाती
जो हर आती जाती 
सांसें जिस्म से रूह 
जुदा कर जाती शायद
इसे ही कहते है 
प्रेम की सौगात

Tuesday, 5 December 2017

मावठ

आओ इस ठण्ड 
की बारिश में 
हम और तुम 
मिलकर खूब भीगे,
थरथराते होंठों और 
ठण्ड से उठती कँपकपी 
को मिटा देते है दोनों की 
अग्नि से और करते है, 
आज संवाद नज़रों से 
आओ ना जी लेता हु ,
तुझे मैं अब पूरी की पूरी,
और तुम भी जी लो मुझे 
पूरा का पूरा 

Monday, 4 December 2017

सच के स्वरूप

कई बार सोचता हूँ
तो लगता है की, 
सच का स्वरुप तो 
एक होता है पर ,
हम दोनों के लिए
दो अलग-अलग ही रहा ,
जहा सच के स्वरूप 
दो हो वंहा समय 
अपनी बात कुछ 
इस तरह से कह  
जाता है कि......
वह बदल देता है
रिश्तों के मायने ,
फिर आखिर कैसे टिके 
वो रिश्ते जिनमे सच 
के स्वरुप दो होते है ,
ऐसे रिश्ते कहा तक
निभ सकते है ?

Sunday, 3 December 2017

रिश्तो की चादर

ऐसा पहली 
बार नहीं है की
रिश्तो की चादर को
फटते हुए देखा हो  
हज़ारो बार देखा है 
फिर उन्ही को सीने
की कोशिश में बीतते है 
ज़िन्दगी के पल
और पलों में सदियाँ 
पहली बार नहीं हुआ 
ऐसा जब देखा हो  
ज़िन्दगी को रूठते हुए  
खुद से ही लेकिन  
फिर देखा है उसे ही 
बुलाते हुए भी बस 
रहता हु मैं इसी  
उधेड़बुन में की  
सीऊ रिश्तो की चादर
या जाऊ ज़िन्दगी 
के बुलावे पर पास उसके 

Saturday, 2 December 2017

तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद
भी तुम्हारे यहाँ होने 
का भ्रम होता है मुझे 
जैसे हिलते हाथ और 
मुड़ती पीठ दिखती है मुझे ,
पर आँख झपकते ही
तुम्हें न पाकर यहाँ 
अचानक आँखें बरस पड़ती है, 
जबरन रोके भी पानी 
भला कहाँ रुकता है,
तेरे जाने के बाद
ढूंढता रहता हूँ
अमर बेल की जडें
जिस्म की मिट्टी में,
तुम्हारी आवाज अब भी
लिपटी हुई है जैसे ..
मेरे जेहन से पर तुम
नहीं होती हो पास मेरे 

Friday, 1 December 2017

बेमौसमी बारिश

महसूस किया है 
तुमने कभी की 
कठोर सा दिखने 
वाला पुरुष भी 
भीगा करता है, 
उस धुप भरी 
दोपहरी में भी ,
जब कभी तुम 
उसे अकेला छोड़ 
कर चली जाती हो, 
तब होती है बेमौसमी
बारिश वंहा जहा ,
कुछ पल को तुम 
ठहरी थी उसके साथ, 
जिस दिन देखोगी तुम  
उसे उस बारिश में 
भीगते उस दिन, 
जा नहीं पाओगी 
तुम छोड़ कर 
उसे अकेला यु ;

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...