Thursday, 7 December 2017
Tuesday, 5 December 2017
Monday, 4 December 2017
सच के स्वरूप
कई बार सोचता हूँ
तो लगता है की,
सच का स्वरुप तो
एक होता है पर ,
हम दोनों के लिए
दो अलग-अलग ही रहा ,
जहा सच के स्वरूप
दो हो वंहा समय
अपनी बात कुछ
इस तरह से कह
जाता है कि......
वह बदल देता है
रिश्तों के मायने ,
फिर आखिर कैसे टिके
वो रिश्ते जिनमे सच
के स्वरुप दो होते है ,
ऐसे रिश्ते कहा तक
निभ सकते है ?
तो लगता है की,
सच का स्वरुप तो
एक होता है पर ,
हम दोनों के लिए
दो अलग-अलग ही रहा ,
जहा सच के स्वरूप
दो हो वंहा समय
अपनी बात कुछ
इस तरह से कह
जाता है कि......
वह बदल देता है
रिश्तों के मायने ,
फिर आखिर कैसे टिके
वो रिश्ते जिनमे सच
के स्वरुप दो होते है ,
ऐसे रिश्ते कहा तक
निभ सकते है ?
Sunday, 3 December 2017
रिश्तो की चादर
ऐसा पहली
बार नहीं है की
रिश्तो की चादर को
फटते हुए देखा हो
हज़ारो बार देखा है
फिर उन्ही को सीने
की कोशिश में बीतते है
ज़िन्दगी के पल
और पलों में सदियाँ
पहली बार नहीं हुआ
ऐसा जब देखा हो
ज़िन्दगी को रूठते हुए
खुद से ही लेकिन
फिर देखा है उसे ही
बुलाते हुए भी बस
रहता हु मैं इसी
उधेड़बुन में की
सीऊ रिश्तो की चादर
या जाऊ ज़िन्दगी
के बुलावे पर पास उसके
बार नहीं है की
रिश्तो की चादर को
फटते हुए देखा हो
हज़ारो बार देखा है
फिर उन्ही को सीने
की कोशिश में बीतते है
ज़िन्दगी के पल
और पलों में सदियाँ
पहली बार नहीं हुआ
ऐसा जब देखा हो
ज़िन्दगी को रूठते हुए
खुद से ही लेकिन
फिर देखा है उसे ही
बुलाते हुए भी बस
रहता हु मैं इसी
उधेड़बुन में की
सीऊ रिश्तो की चादर
या जाऊ ज़िन्दगी
के बुलावे पर पास उसके
Saturday, 2 December 2017
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
भी तुम्हारे यहाँ होने
का भ्रम होता है मुझे
जैसे हिलते हाथ और
मुड़ती पीठ दिखती है मुझे ,
पर आँख झपकते ही
तुम्हें न पाकर यहाँ
अचानक आँखें बरस पड़ती है,
जबरन रोके भी पानी
भला कहाँ रुकता है,
तेरे जाने के बाद
ढूंढता रहता हूँ
अमर बेल की जडें
जिस्म की मिट्टी में,
तुम्हारी आवाज अब भी
लिपटी हुई है जैसे ..
मेरे जेहन से पर तुम
नहीं होती हो पास मेरे
भी तुम्हारे यहाँ होने
का भ्रम होता है मुझे
जैसे हिलते हाथ और
मुड़ती पीठ दिखती है मुझे ,
पर आँख झपकते ही
तुम्हें न पाकर यहाँ
अचानक आँखें बरस पड़ती है,
जबरन रोके भी पानी
भला कहाँ रुकता है,
तेरे जाने के बाद
ढूंढता रहता हूँ
अमर बेल की जडें
जिस्म की मिट्टी में,
तुम्हारी आवाज अब भी
लिपटी हुई है जैसे ..
मेरे जेहन से पर तुम
नहीं होती हो पास मेरे
Friday, 1 December 2017
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उषा का प्रादुर्भाव
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