Wednesday, 8 November 2017

तुम्हारी चुप्पियाँ


मै समेट कर रख लूंगा 
तुम्हारी चुप्पियाँ 
और यादों से कहूंगा 
बहना बंद करो 
पत्थरों से पानी 
नहीं निकलता 
तुम्हारी कोहनियाँ 
छिल जाएँगी 
लहूलुहान हो जाएँगी 
आंसुओं के सूखने के बाद 
नमक नहीं बहता 
बस जम जाता है 
मन के किसी कोने में 
यादों की ईंट चिन कर 
एक नमक का 
बांध बनाना है 
ये दर्द फ़िर नहीं 

गुनगुनाना है
बिना किसी शिकायत 

के जीना है और 
जाते समय 
सारा कुछ साथ 

लेकर जाना है

Tuesday, 7 November 2017

तन्हाई के बादल

विरह का सावन 
ही देखा है मैंने  
अब तक जंहा 
तन्हाई के बादल 
घेरे रहते है और 
मेरे दिल की गीली 
ज़मीन पर बोया हुआ 
तुम्हारी यादों का बीज
अंकुरित हो उठता है...
आँखों के मानसून से
भीग उठती है 
दिल की कायनात
वक्त की गर्द से ढकी
मेरे संयम की दीवार का 
ज़र्रा ज़र्रा चमक उठता है 
धुलकर और तब
तेरे और मेरे बीच
नहीं रहता वक्त का फासला
रूहें मिलती हैं पूरी शिद्दत से
और मोहब्बत को मिलते हैं
नए मायने....

Monday, 6 November 2017

पूर्णविराम

कितनी उम्र 
गुजारनी पड़ती है अकेले,
एक हमसफ़र पाने को    
कैसे गतिमान होता है ,
हमारा अकेलापन उस 
हमसफ़र तक पहुंचने को,
लेकिन ये हम में से किसी को 
नहीं पता होता की    
उस तक पहुंचने के बाद
मिलेगा पूर्णविराम 
हमारी चाहत को,
या दुनियावी  दिखावे के कारन 
हम कंही गाला घोंट देंगे
उस चाहत का 

Saturday, 4 November 2017

तुम्हारे अस्तित्व की चादर

वो दिन भी 
अच्छी से आज 
भी याद है मुझे,
जब मैं चुपके से 
मैं तुम्हे टुकुर-टुकुर 
ताका करता था ,
जैसे तुम्हारे अस्तित्व 
की चादर हटाकर 
ढूंढ रहा था मैं ,  
कोई जाना-पहचाना 
सा चेहरा,
मैं लाख मना करू  
पर मुझे था इंतज़ार 
जरूर किसी का 
वो दिन भी 
अच्छी से आज 
भी याद है मुझे,
जब मैं चुपके से 
मैं तुम्हे टुकुर-टुकुर 
ताका करता था ,
वो दिन तुमने 
अपने हाथो लौटाए
है बैरंग अब चाहती हो ,
फिर वो लौट कर आये वापस 
पर जो दिन बीत जाते है ,
वो कंहा आते है 
लौट कर वापस बोलो 

Friday, 3 November 2017

तुम्हारी अभिलाषा


हाँ मुझे है
तुम्हारी अभिलाषा,
क्योंकि तुम्हारा
साथ कभी भी
मुझे भटकने
नहीं देता...
तुम्हारा कोमल सा,
नरम सा स्पर्श
मुझे कोई तकलीफ
नहीं देता...
तुम्हारा मेरे
जीवन में होना
मुझे कभी शुन्य
नहीं होने देता...
शायद ये तुम्हारी
अभिलाषा ही है,
जो मेरे जीवन को संपूर्ण बनाती है..

Thursday, 2 November 2017

माँगा था साथ


मैंने कुछ भी 
तो नहीं माँगा 
तुमसे एक 
ज़िन्दगी भर
के साथ 
के अलावा 
तुमने बदले में  
घबराकर मुझसे 
मेरी रातें ही 
मांग ली और 
देखो ना मैंने
कुछ सोचे बिना 
ही तुम्हे दे भी दी 
अपनी रातें 

Wednesday, 1 November 2017

तेरे जिस्म में एहसास बन समाया हु

तुम्हारी यादो 
के जिस्म में 
एहसास बन 
समाया हु मैं ,
जिन्हें यादो संग 
मैंने पहना हुआ है ,
और अब इसी लिबास 
को पहन रखना 
चाहता हु ,
मैंने तुम्हारे एहसास को 
किताबो में बांध 
लिया है हर्फो संग 
रोज अक्षर दर अक्षर 
सजाया करता हु ,
तेरे नाम से 
हर एक हर्फ़
चमकता है,
तेरी आँखों की 
ख़ामोशी से 
अपना नाम जोड़कर 
कविता लिखता हु
रात भर और , 
सिमटता रहता हु
तुम संग सारी रात 
यंहा इन किताबो में 
हर्फो में और रात में  ,
तुम बिलकुल मेरे 
पास हो साथ हो 
अभी। ..

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...