Friday, 8 September 2017

क्या-क्या नहीं खोया

तुमने क्या-क्या नहीं खोया 
यंहा तक की जो था सब
तुम्हारे ही अंदर वो भी है खोया
ये दूरिया ही तो थी जिसने हमे
रखा था अलग कर और ये मेरा
पागलपन ही तो है जो अब भी
बंधे है हम दोनों एक ही डोर में
देखो अगर प्रेम के सृजन को तो
सूरज की किरण भी कोमल
महसूस होती है किन्यु की
उस किरण के बिना कोई फूल
खिलता कंहा है धरती पर
और अगर देखो नहीं
उस इसे प्रेम की नज़र से
तो वो किरण चुभती भी है
प्रेम बंधन को स्वीकारता है
और स्वक्छंदता पैरों को
कहा बांध सकती है 

Thursday, 7 September 2017

रात की पूर्णता

जिस तरह चाँद
प्रेम में आता है 
यु रोज उस पर्वत 
के पार से इस पार 
और रात को देता है 
एक उद्देश्यपूर्ण की   
वैसा ही तो कुछ 
चाहा था मैंने भी 
जीना तुम्हारे साथ 
पर तुम नहीं चाहती थी 
शायद की मिले हमारे 
प्रेम को पूर्णता इसलिए
सिर्फ एक मेरा चाहना 
रह गया अधूरा 

Wednesday, 6 September 2017

प्रेम था निर्भीक

उसने शायद कल्पना 
की होगी मेरे प्रेम की 
और मान लिया होगा 
उसको एक अंगूठी पर
मेरा प्रेम तो था एकदम 
निर्भीक और हठी जिमे
ना तो किसी का डर था
ना की सुनता था प्रेम के
के लिए दूसरे के द्वारा
कहे गए कोई भी सब्द 
वो तो एक आवरण सा था
जो छाया रहता था हर वक़्त
उसके चारो ओर पर उसने 
शायद मेरे प्रेम को समझा
एक अंगूठी नहीं समझी वो
की मेरा प्रेम  निर्भीक था 
जो बहा ले जाएगा मुझे 
मेरे अवसान की ओर

Tuesday, 5 September 2017

हाथो को लेकर अपने हांथो में

जिसे हम प्रेम 
करते है उसके हाथो 
को लेकर अपने हांथो में
हम अक्सर सोचते है
ये हाथ यु ही रहे 
सदा हाथो में मरते 
दम तक उन्ही हांथो
की उरमा हमे देती है
हर उस वक़्त एक नया
जीवन जब हमे लगता है
नीरस ये जीवन और हम
एक बार फिर से जी उठते है
पर मुझे तुम्हारा हाथ 
से अब तक नहीं मिली वो 
उरमा उस वक़्त भी जब
नहीं होती मेरी और
जीने की ईक्षा 

Monday, 4 September 2017

रात और दिन मिलते है


हर रात ही अपनी 
राह खोजता रहा 
मेरा मन कितनी ही 
निराशाओं के गलियारों 
से गुजरता हुआ
जब तक की रात 
अपने दिन से मिल 
अभिभूत नहीं हो जाती 
और जब छाने 
लगता है उजाला
हवाएं धीमी धीमी हो 
बंद हो जाती है
फिर वही मेरा मन 
होकर उदास 
निकल पड़ता है 
अपनी राह पर 
खाली हाथ 

Saturday, 2 September 2017

रात आती है मेरे आगे

अक्सर 
देर रात तक 
अकेले जागते जागते 
थक जाता हु मैं और 
उस वक़्त जब सब 
सो जाते है और सोने
की तैयारी में होती है 
रात भी तब एक समय 
ऐसा आता है जब दरवाज़ा 
बंद करना होता है मुझे
तब पूरी की पूरी रात 
खुल कर आती है मेरे आगे

Friday, 1 September 2017

सुन्दर स्वर में सुनना

तुम्हारे बारे में सोचना
मुझमे संचार करता था  
एक नयी हिम्मत का 
एक नयी आशा का 
एक नयी सपना का 
एक नए दिन का 
एक नयी ज़िन्दगी का 
जैसे पृथ्वी के सबसे 
सुन्दर स्वर में सुनना
एक प्रेम गीत पर 
आज वही आशा एक
निराशा में तब्दील हो रही है 
जब आशा बहुत लम्बी
खींची चली जाती है 
तब ऐसा ही होता है 
और आज वही तुम्हारे 
बारे में सोचना मुझमे
उन सभी आशा सपने
दिन और ज़िन्दगी को 
समाप्त करने जैसा 
हो गया है 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...