Tuesday, 31 December 2019

हांथों की लकीरों !


तुझे अपना बनाने का जो ख्वाब है ,  
उसे अपनी आँखों में सजाये बैठा है वो ; 

अपने हांथों की लकीरों में तेरे ही ,
नाम की एक लकीर बना रहा है वो ; 

तुझे खोने के डर से ख़ौफ़ज़दा है वो ,
अश्क़ों को अपनी पलकों में सजाये बैठा है वो ;

बिखरे हुए ख़्वाबों के टुकड़े बटोरकर ,
नए ख़्वाबों को ढाढ़स बंधा रहा है वो ;

सिसकती अपनी सांसों को सीने में दबाये ,
नई उम्मीदों पर महल खड़ा कर रहा है वो ;

अपने ज़ज़्बातों से कुछ इस तरह लड़ रहा है वो ;
कि किस्तों में हंस रहा है किस्तों में रो रहा है वो !

बंद मुट्ठी !


मुट्ठी में रख लूंगा !

सोचा था मैंने 
इस मेरी मुट्ठी में  
संभाल कर और  
सबसे छुपा कर 
रख लूंगा मैं तुम्हें ! 

बड़े जतन से 
बंद की थी ये 
मुट्ठी मैंने रख 
कर यु अंदर तुम्हें !

पर न जाने कैसे 
और कब फिसल  
कर मेरी मुट्ठी से यूँ  
बीतते इस वर्ष की 
भांति आगे बढ़ गई तू ! 
  
सूखी रेत की किरकिरी 
की तरह मेरी इस हस्ती 
में रड़कती रह गयी तू !

अब जब देखता हूँ  
खुद की मुट्ठी तो आँखें 
मेरी यु ही बरबस समंदर 
हुए जाती है ! 

Monday, 30 December 2019

मेरी मन्नत !


मेरी मन्नत !

मैं उसे पाने को अपने रब से 
मन्नत और उसके कुछ अपनों 
से इल्तिज़ा किया करता हूँ ! 
जिसके लिए मैं कुछ अपनों 
और कुछ परायों का दिल अक्सर 
ही दुखा दिया करता हूँ ! 
मैं अब तो अक्सर ही अँधेरे में 
भी एक उससे ही तो बातें किया 
करता हूँ !
अब तक किसी को कुछ हासिल 
नहीं हुआ कुछ भी इस ज़िद्द से ये 
जानता हूँ !
मैं फिर भी ना जाने क्यों ये एक 
ज़िद्द अब बस दुआ की ही तरह 
किया करता हूँ !
समझाते है सभी अक्सर मुझे 
गर मेरी है वो तो कंही और वो 
जा नहीं सकती है !
गर परायी है तो मैं उसे पा नहीं 
सकता हूँ ! 
पर ना जाने क्यों ये ज़िद्द अब 
मैं बस दुआ की तरह किया 
करता हूँ !

Sunday, 29 December 2019

चाह !


चाह !

अधर तेरे जलते 
दिये से ;
लफ्ज़ तेरे जलती 
बाती से ;
मुस्कान तेरी उसकी 
लौ सी ;
इन्हे निहारूँ तो छूने 
की चाह ;
छु लूँ तो चुम लेने 
की चाह ;
चुम लूँ तो जल जाने 
की चाह ;
जलने लगूँ तो फ़नाह  
होने की चाह ;
फ़नाह हो जाऊँ तो फिर से 
मिलने की चाह ;
अधर तेरे जलते 
दिये से !   

Saturday, 28 December 2019

मैं होता हूँ वहां !


कुछ भी हाँ कुछ भी कहाँ होता है वहाँ , 
जब तुम मेरे साथ नहीं होती हो वहाँ ;
  
सिर्फ सन्नाटें की दीवारें होती है वहाँ ,  
और बेक़रारियों की छत होती है वहाँ ;

बेताबियों की बेतरतीब जमीं होती है वहाँ ,  
हाँ हरी परत तो बिल्कुल नहीं होती है वहाँ ; 

आसमान का नीला आंचल नहीं होता है वहाँ ,  
हवाओं के बीच कंही झूल रहा होता हूँ मैं वहाँ ;

तुम और तुम्हारी बेसुध यादें होती है वहाँ ,  
तेज़-तेज़ दौड़ती हुई धड़कने होती है वहाँ ;
   
मेरे काबू से बहार मेरी ही सांसें होती है वहाँ , 
और मैं एकदम तन्हा अकेला होता हूँ वहाँ ; 

तन्हाई की जुबान पर मेरा नाम होता है वहाँ , 
तब भी मेरी जुबान पर तेरा नाम होता है वहाँ ;

खुद-ब-खुद से अजब सी तकरार होती है वहाँ ,
और टूटता बिखरता हुआ सा होता हूँ मैं वहाँ ;

तारो की टिमटिमाहट भी जलती बुझती है वहाँ , 
हाँ मेरी तमाम उलझने भी हैरान होती है वहाँ ;

मेरी सारी संवेदनाएं बिलकुल बेबस होती है वहाँ ,
फिर भी एक तुम्हे अपने सबसे करीब पता हूँ वहाँ ; 

तुम्हें अपने पास बुलाने की उम्मीद में प्रखर होता है वहाँ ; 
तब ही तो तुम्हे तुम्हारे इंतज़ार में बैठा मिलता हूँ मैं वहां !

Friday, 27 December 2019

तुम ही बताओ !


तुम ही बताओ !

मैं तुम्हारे दर्द पर  
कविता लिखूंगा तो 
क्या कवि हो जाऊँगा ! 
तुम्हारे उसी दर्द की टीस  
पर गर मर्सिये गाऊंगा तो 
क्या चर्चा में आ जाऊंगा ! 
तुम्हारे दर्द के लिए 
किसी से दो-दो हाथ होने 
की जगह गर सिर्फ कागज़ 
को काला करता रहूँगा !
तो क्या योद्धा होने के 
गुमान को अपने जहन 
में पाल सकूंगा ! 
तुम्हारी दर्द में छुपी हुई  
एक हंसी को गर मैं तलाश 
भी लूंगा तो क्या मैं चैन 
को पा सकूँगा !
तुम ही बताओ ना 
क्या मैं ऐसा कर के 
अपने जमीर को जिंदा 
रख पाऊंगा !

Thursday, 26 December 2019

मेरी क्रिसमस !


मेरी क्रिसमस !

इतनी ठंडक भरी रातों
में भी जो मैरी क्रिसमस
मैरी क्रिसमस गाते-गाते 
आता है !

वही जो अपने साथ एक 
थैला भी भरकर लाता है !

उस थैले में वो सभी के
लिए थोड़ी थोड़ी खुशियां
भरकर लाता है !

वो संसार के सभी बच्चों
पर यीशु मसीह का प्यार 
लुटाने ही तो आता है !

जो हर दिसंबर की चौबीस 
तारीख की रात को ही तो 
आता है ! 

वही तो है जिसको सारे
बच्चे सांता-सांता कह कर
बुलाते है !

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...